कैंसर के इलाज के बाद क्यों बढ़ता है लिम्फेडेमा का खतरा? जानें सुपर माइक्रोसर्जरी से कितनी हो सकती है रोकथाम

Saroj kanwar
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कैंसर सिर्फ बीमारी के दौरान ही नहीं, बल्कि इलाज पूरा होने के बाद भी कई तरह की स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बन सकता है। कैंसर के उपचार का असर शरीर पर लंबे समय तक रह सकता है और कुछ मरीजों में बाद में ऐसी जटिलताएं भी देखने को मिलती हैं, जिन पर समय रहते ध्यान देना जरूरी है। इन्हीं समस्याओं में लिम्फेडेमा (Lymphedema) भी शामिल है।

लिम्फेडेमा एक ऐसी स्थिति है, जिसमें शरीर के किसी हिस्से, खासकर हाथ या पैर में लिम्फ द्रव जमा होने लगता है। इसकी वजह से प्रभावित हिस्से में लंबे समय तक सूजन बनी रह सकती है। स्तन कैंसर या स्त्री रोगों से जुड़े कैंसर के उपचार के दौरान लिम्फ नोड्स को हटाने या रेडिएशन थेरेपी के बाद इस समस्या का जोखिम बढ़ सकता है।

अगर लिम्फेडेमा की पहचान शुरुआती स्तर पर न हो और समय पर उपचार शुरू न किया जाए, तो दर्द, त्वचा में बदलाव और बार-बार संक्रमण जैसी परेशानियां हो सकती हैं। इसका असर मरीज की रोजमर्रा की गतिविधियों और जीवन की गुणवत्ता पर भी पड़ सकता है।

लिम्फेडेमा के इलाज में माइक्रोसर्जरी भी एक विकल्प

कैंसर के उपचार के बाद होने वाले लिम्फेडेमा को नजरअंदाज करने के बजाय समय पर इसकी जांच और देखभाल जरूरी है। विशेषज्ञों के अनुसार, कैंसर के इलाज के बाद सामने आने वाली जटिलताओं पर भी उतना ही ध्यान दिया जाना चाहिए जितना कैंसर की बीमारी पर दिया जाता है।

डॉ. प्रीथा रेड्डी, एग्जिक्यूटिव वाइस चेयरपर्सन, अपोलो हॉस्पिटल्स ग्रुप के अनुसार, कैंसर के बाद लिम्फेडेमा जैसी समस्याओं को गंभीरता से लेना जरूरी है। इसी दिशा में अपोलो हॉस्पिटल्स के वीमेन कैंसर सेंटर, अपोलो एथेना ने एक वन-स्टॉप कंप्रेहेंसिव लिम्फेडेमा क्लिनिक शुरू किया है। यह क्लिनिक लिम्फेटिक एजुकेशन एंड रिसर्च नेटवर्क से मान्यता प्राप्त है।

इस तरह के सेंटर में मरीज की समस्या का आकलन करने के साथ उसके लिए आवश्यक उपचार और आगे की देखभाल की योजना तैयार की जा सकती है।

समय पर इलाज न मिलने पर बढ़ सकता है संक्रमण का खतरा

कैंसर के बाद विकसित होने वाले लिम्फेडेमा का सही समय पर इलाज कराना बेहद महत्वपूर्ण है। लंबे समय तक इसे नजरअंदाज करने से प्रभावित हिस्से में गंभीर संक्रमण का खतरा बढ़ सकता है।

वन-स्टॉप कंप्रेहेंसिव लिम्फेडेमा क्लिनिक का उद्देश्य कैंसर से जुड़े लिम्फेडेमा की पहचान, उपचार और उसके बाद की देखभाल को एक व्यवस्थित प्रक्रिया के तहत उपलब्ध कराना है। विशेषज्ञों के मुताबिक, गंभीर संक्रमण कुछ परिस्थितियों में मरीज के लिए खतरनाक भी हो सकता है। इसलिए शरीर के किसी हिस्से में लगातार सूजन दिखाई देने पर चिकित्सकीय सलाह लेना जरूरी है।

भारत में लाखों लोग लिम्फेडेमा से प्रभावित

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, भारत में 6 लाख से अधिक लिम्फेडेमा के मामले सामने आए हैं। इनमें ऐसे मरीज भी शामिल हो सकते हैं, जिनमें यह समस्या कैंसर के उपचार के बाद विकसित हुई हो।

डॉ. समर्थ गुप्ता, सीनियर कंसल्टेंट प्लास्टिक एवं ब्रेस्ट रिकॉन्स्ट्रक्शन सर्जन, अपोलो एथेना के अनुसार, लिम्फेडेमा का प्रबंधन केवल एक तरीके से नहीं किया जा सकता। मरीज की स्थिति के आधार पर एक समन्वित उपचार योजना की जरूरत होती है।

इसमें बीमारी की सही पहचान और गंभीरता का आकलन करने के बाद जरूरत के अनुसार सर्जरी, रिहैबिलिटेशन और अन्य थेरेपी को शामिल किया जा सकता है।

क्या हर मरीज को सर्जरी की जरूरत पड़ती है?

कैंसर के उपचार के बाद लिम्फेडेमा होने पर यह जरूरी नहीं कि हर मरीज को सर्जरी की आवश्यकता हो। उपचार का तरीका इस बात पर निर्भर करता है कि लिम्फेडेमा कितना गंभीर है और शरीर के किस हिस्से में इसका असर हुआ है।

डॉ. वेंकट रामकृष्णन, कंसल्टेंट प्लास्टिक एंड ब्रेस्ट रिकॉन्स्ट्रक्शन सर्जन, अपोलो एथेना के अनुसार, आमतौर पर सर्जरी की जरूरत उन मामलों में पड़ सकती है, जहां लिम्फेडेमा काफी बढ़ चुका हो और इसके कारण टिश्यू में स्थायी नुकसान हो गया हो।

वहीं, जिन कैंसर मरीजों में भविष्य में लिम्फेडेमा विकसित होने का जोखिम अधिक होता है, उनमें कुछ परिस्थितियों में प्रोफिलैक्टिक लिम्फोवेनस बाईपास (LVB) जैसी प्रक्रिया पर विचार किया जा सकता है।

कैंसर सर्जरी के दौरान भी हो सकता है बचाव

प्रोफिलैक्टिक लिम्फोवेनस बाईपास एक सुपर-माइक्रोसर्जिकल प्रक्रिया है, जिसका उद्देश्य लिम्फेडेमा के भविष्य के जोखिम को कम करना है। इसे कुछ मामलों में कैंसर की सर्जरी के दौरान ही किया जा सकता है।

इस प्रक्रिया में एक्सिलरी लिम्फ नोड्स के एक हिस्से को हटाने के दौरान लिम्फेटिक ड्रेनेज सिस्टम को छोटी रक्त वाहिकाओं के साथ जोड़ने की कोशिश की जाती है, ताकि लिम्फ द्रव के प्रवाह को बनाए रखने में मदद मिल सके।

हालांकि, इस तरह की प्रक्रिया हर मरीज के लिए उपयुक्त हो, यह जरूरी नहीं है। इसका निर्णय मरीज की बीमारी, कैंसर के उपचार और लिम्फेडेमा के जोखिम जैसे कई कारकों को ध्यान में रखकर विशेषज्ञ करते हैं।

निष्कर्ष

कैंसर का इलाज पूरा होने के बाद भी शरीर में होने वाले बदलावों पर नजर रखना जरूरी है। हाथ या पैर में लंबे समय तक रहने वाली सूजन को सामान्य मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। यह लिम्फेडेमा का संकेत हो सकता है। शुरुआती पहचान और विशेषज्ञ की सलाह से इसकी गंभीरता को नियंत्रित करने और आगे होने वाली जटिलताओं के जोखिम को कम करने में मदद मिल सकती है।

डिस्क्लेमर: यह लेख केवल शैक्षणिक और सूचनात्मक उद्देश्य से तैयार किया गया है। इसमें कैंसर के उपचार के बाद होने वाले लिम्फेडेमा, उसके संभावित जोखिम और उपचार के विकल्पों से जुड़ी सामान्य जानकारी दी गई है। किसी भी स्वास्थ्य समस्या के लिए योग्य डॉक्टर या विशेषज्ञ से व्यक्तिगत सलाह लेना जरूरी है।

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