सरकार टैक्स व्यवस्था को और सरल बनाने की दिशा में एक और बड़ा कदम उठाने की तैयारी कर रही है। कॉरपोरेट टैक्स, इनकम टैक्स और जीएसटी में बदलाव के बाद अब कस्टम ड्यूटी (Custom Duty) को तर्कसंगत बनाने पर जोर दिया जा रहा है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने संकेत दिया है कि आगामी बजट में आयात शुल्क को कम करने और इसकी संरचना को आसान बनाने पर विशेष ध्यान दिया जा सकता है।
वित्त मंत्री ने गुरुवार को कहा कि सरकार की कोशिश है कि 2027-28 के बजट तक अधिकांश वस्तुओं पर कस्टम टैरिफ सिंगल डिजिट में आ जाए। हालांकि, कुछ चुनिंदा उत्पाद इससे बाहर रह सकते हैं। उन्होंने बताया कि पिछले कुछ समय में कस्टम ड्यूटी के ढांचे को काफी हद तक सरल बनाया गया है।
कस्टम टैरिफ को आसान बनाने पर फोकस
NCAER के एक कार्यक्रम में बोलते हुए वित्त मंत्री ने कहा कि सरकार कस्टम टैरिफ को ज्यादा व्यावहारिक और सरल बनाने की दिशा में लगातार काम कर रही है। पिछले बजटों में भी इस क्षेत्र में कई सुधार किए गए हैं।
इन बदलावों का एक प्रमुख उद्देश्य कस्टम ड्यूटी के अलग-अलग स्लैब को कम करना और इनवर्टेड ड्यूटी स्ट्रक्चर को दुरुस्त करना रहा है। इनवर्टेड ड्यूटी स्ट्रक्चर उस स्थिति को कहा जाता है, जब किसी तैयार उत्पाद पर लगने वाला आयात शुल्क उसके निर्माण में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल या इनपुट की तुलना में कम होता है।
सरकार का मानना है कि टैरिफ व्यवस्था को सरल बनाने से कारोबार करने में आसानी बढ़ेगी और घरेलू उद्योग को भी बेहतर प्रतिस्पर्धी माहौल मिल सकता है।
प्राइवेट सेक्टर का भरोसा बढ़ा
वित्त मंत्री ने अर्थव्यवस्था में निजी क्षेत्र की भूमिका पर भी बात की। उन्होंने कहा कि कोरोना महामारी के बाद केंद्र सरकार ने कैपिटल एक्सपेंडिचर यानी पूंजीगत खर्च में बढ़ोतरी की है। इससे निजी क्षेत्र के बीच भरोसा मजबूत हुआ है और कंपनियों को नए निवेश तथा जोखिम लेने के लिए प्रोत्साहन मिला है।
उन्होंने कहा कि सरकार की ओर से इंफ्रास्ट्रक्चर और अन्य क्षेत्रों में पूंजीगत निवेश बढ़ाने से निजी क्षेत्र को भी अपनी निवेश योजनाओं को आगे बढ़ाने का बेहतर माहौल मिला है।
राज्यों के कर्ज पर भी वित्त मंत्री की सलाह
वित्त मंत्री ने राज्यों की उधारी और कर्ज प्रबंधन को लेकर भी महत्वपूर्ण बात कही। उनका कहना था कि राज्यों को एसेट बनाने के लिए उतना ही कर्ज लेना चाहिए, जितना वे भविष्य में आसानी से चुका सकें। जरूरत से ज्यादा कर्ज लेने से आने वाली पीढ़ियों पर वित्तीय बोझ बढ़ सकता है।
सीतारमण ने बताया कि कई राज्य अब अपने कर्ज की स्थिति को लेकर पहले की तुलना में अधिक जागरूक हैं। कुछ राज्यों ने अपने पुराने कर्ज को संभालने और उसकी संरचना में बदलाव के लिए मंत्रालय की टीम से चर्चा भी की है।
उन्होंने कहा कि कर्ज को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। राज्यों को यह समझना होगा कि उधार ली गई रकम की जिम्मेदारी भी तय होती है और उसका प्रबंधन लंबे समय की वित्तीय योजना के साथ किया जाना चाहिए।
कर्ज लेना जरूरी, लेकिन इस्तेमाल पर हो ध्यान
पब्लिक डेट से जुड़े सवाल पर वित्त मंत्री ने कहा कि किसी भी देश के लिए केवल अपने मौजूदा संसाधनों के भरोसे विकास करना संभव नहीं है। इसलिए जरूरत पड़ने पर कर्ज लेना जरूरी हो सकता है।
हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि कितना कर्ज लिया जाए और उसका इस्तेमाल किस उद्देश्य के लिए किया जाए, इस पर सावधानी से फैसला होना चाहिए। कर्ज का इस्तेमाल ऐसे कामों में किया जाना चाहिए, जिससे अर्थव्यवस्था और भविष्य की आय क्षमता मजबूत हो तथा वित्तीय बोझ को नियंत्रित रखा जा सके।