शेयर बाजार में 2 बजे के बाद अचानक बड़ी गिरावट, निफ्टी 125 अंक लुढ़का; जानें 3 बड़े कारण

Saroj kanwar
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नई दिल्ली: भारतीय शेयर बाजार ने सप्ताह के ज्यादातर कारोबारी दिनों में मजबूती दिखाई, लेकिन शुक्रवार को निवेशकों की सतर्कता बढ़ गई। सप्ताह के अंत में सेंसेक्स और निफ्टी पर दबाव देखने को मिला। हालांकि, शुक्रवार की गिरावट के बावजूद पूरे सप्ताह का प्रदर्शन सकारात्मक रहा। इस सप्ताह निफ्टी में करीब 1 फीसदी की बढ़त रही, जबकि सेंसेक्स लगभग 0.8 फीसदी मजबूत हुआ।

शुक्रवार की कमजोरी के पीछे कई कारण माने जा रहे हैं। निवेशकों ने हाल की तेजी के बाद कुछ मुनाफा बुक किया और जोखिम वाले निवेश से दूरी बनाई। इसके अलावा कच्चे तेल की बढ़ती कीमत, ईरान से जुड़े भू-राजनीतिक तनाव और विदेशी निवेशकों की बिकवाली ने भी बाजार के सेंटीमेंट को प्रभावित किया।

सोमवार से बाजार में दिखा नया बदलाव

भारतीय शेयर बाजार में सोमवार से क्लोजिंग ऑक्शन सेशन (CAS) की नई व्यवस्था लागू हुई है। यह व्यवस्था इक्विटी कैश सेगमेंट में शुरू की गई है और इसका उद्देश्य शेयरों के अंतिम भाव को ज्यादा व्यवस्थित और पारदर्शी तरीके से तय करना है।

इक्विटी कैश सेगमेंट में सामान्य तौर पर शेयरों की खरीद-बिक्री होती है। वहीं, फ्यूचर्स एंड ऑप्शंस (F&O) सेगमेंट में शेयरों और इंडेक्स से जुड़े डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट्स का कारोबार किया जाता है।

नई क्लोजिंग ऑक्शन व्यवस्था के तहत बाजार बंद होने से पहले कुछ निर्धारित शेयरों के खरीद और बिक्री ऑर्डर को एक साथ मिलाकर अंतिम कीमत निर्धारित की जाती है। इसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि किसी शेयर का क्लोजिंग प्राइस अधिक व्यवस्थित तरीके से तय हो।

हालांकि, नई व्यवस्था लागू होने के बाद कुछ शेयरों और बाजार सूचकांकों में अलग-अलग तरह की गतिविधियां देखने को मिली हैं। ऐसे में बाजार भागीदार इस बदलाव के शुरुआती प्रभावों पर नजर बनाए हुए हैं।

कच्चे तेल की कीमतों ने बढ़ाई बाजार की चिंता

शुक्रवार को अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमत 1.16 फीसदी बढ़कर 83.45 डॉलर प्रति बैरल हो गई। इसके साथ ही ब्रेंट क्रूड लगातार तीसरे कारोबारी सत्र में बढ़त के साथ बंद हुआ।

भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़ी मात्रा में कच्चे तेल का आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमत बढ़ने का असर भारतीय अर्थव्यवस्था से लेकर शेयर बाजार तक दिखाई दे सकता है।

कच्चे तेल के महंगा होने से देश का आयात बिल बढ़ सकता है। इसके लिए अधिक विदेशी मुद्रा खर्च करनी पड़ती है, जिससे व्यापार घाटे पर दबाव बढ़ने की संभावना रहती है।

इसके अलावा महंगा तेल पेट्रोल-डीजल और परिवहन लागत को प्रभावित कर सकता है। कंपनियों के लिए कच्चा माल और तैयार उत्पादों की ढुलाई महंगी होने से उत्पादन लागत बढ़ सकती है। इसका असर कंपनियों के मुनाफे और व्यापक स्तर पर महंगाई पर पड़ सकता है।

यही कारण है कि कच्चे तेल की कीमतों में लगातार तेजी को भारतीय शेयर बाजार के लिए चिंता का संकेत माना जाता है।

ईरान और हॉर्मुज जलडमरूमध्य पर भी नजर

तेल की कीमतों में उछाल के पीछे ईरान और स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज को लेकर बढ़ी चिंताएं भी अहम हैं। ईरान ने ओमान के साथ मिलकर ऐसे जहाजों की आवाजाही पर प्रतिबंध का प्रस्ताव रखा है, जिन्हें वह विरोधी या दुश्मन के रूप में देखता है।

हॉर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है। इस रास्ते से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल और प्राकृतिक गैस अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंचती है।

अगर इस महत्वपूर्ण मार्ग पर जहाजों की आवाजाही बाधित होती है, तो वैश्विक तेल आपूर्ति को लेकर चिंता बढ़ सकती है। सप्लाई में संभावित रुकावट की आशंका बढ़ने पर कच्चे तेल की कीमतों में और तेजी आ सकती है।

एचएसटी वेल्थ के संस्थापक एवं सीईओ हरिसेलवन राधाकृष्णन के मुताबिक, हाल में रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचने के बाद अमेरिकी शेयर बाजार में कमजोरी आई है। निवेशकों ने जोखिम कम करने की कोशिश की है और ऊर्जा कीमतों तथा भू-राजनीतिक परिस्थितियों को लेकर अनिश्चितता बढ़ी है।

उनके अनुसार, तेल की कीमतों में बढ़ोतरी से ईरान और हॉर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़े राजनयिक प्रयासों को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। बाजार को आशंका है कि महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों पर किसी तरह की बाधा उम्मीद से ज्यादा समय तक बनी रह सकती है।

FII की बिकवाली ने भी बढ़ाया दबाव

भारतीय शेयर बाजार में विदेशी संस्थागत निवेशकों यानी FII की गतिविधियां भी शुक्रवार के सेंटीमेंट के लिए महत्वपूर्ण रहीं। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, गुरुवार को एफआईआई ने भारतीय शेयर बाजार में करीब 17.86 करोड़ रुपये की बिकवाली की।

FII में विदेशी फंड, पेंशन फंड, बीमा कंपनियां और अन्य बड़े संस्थागत निवेशक शामिल होते हैं। इनकी ओर से बड़ी मात्रा में निवेश होने के कारण बाजार में इनके खरीद-बिक्री के रुझान पर लगातार नजर रहती है।

जब विदेशी निवेशक भारतीय शेयरों में पैसा लगाते हैं, तो बाजार में लिक्विडिटी और मांग को सहारा मिल सकता है। दूसरी तरफ, लगातार बिकवाली से बाजार पर दबाव बढ़ सकता है।

हालांकि 17.86 करोड़ रुपये की बिकवाली अपने आप में बहुत बड़ी रकम नहीं है, लेकिन विदेशी निवेशकों के रुख को बाजार के लिए एक अहम संकेतक माना जाता है। निवेशक यह देखना चाहते हैं कि विदेशी पूंजी भारतीय इक्विटी बाजार में आ रही है या बाहर निकल रही है।

ग्लोबल मार्केट से भी नहीं मिले मजबूत संकेत

भारतीय बाजार को अंतरराष्ट्रीय शेयर बाजारों से भी बहुत ज्यादा सकारात्मक संकेत नहीं मिले। एशियाई बाजारों में दक्षिण कोरिया का KOSPI और जापान का Nikkei 225 कमजोरी के साथ कारोबार करते नजर आए।

अमेरिकी शेयर बाजार भी गुरुवार के कारोबारी सत्र में गिरावट के साथ बंद हुए। शुक्रवार को डाउ फ्यूचर्स और एसएंडपी फ्यूचर्स में भी कमजोरी दिखाई दी।

अमेरिकी और एशियाई बाजारों में उतार-चढ़ाव का असर भारतीय बाजार पर भी पड़ता है। खासकर विदेशी निवेशक वैश्विक स्तर पर जोखिम बढ़ने की स्थिति में अपने निवेश को सुरक्षित परिसंपत्तियों की ओर ले जा सकते हैं या उभरते बाजारों में अपनी हिस्सेदारी घटा सकते हैं।

हाल की रिकॉर्ड तेजी के बाद वॉल स्ट्रीट में आई गिरावट ने भी निवेशकों को सतर्क किया है। अब बाजार की नजर इस बात पर है कि ऊंचे शेयर वैल्यूएशन के बीच महंगा कच्चा तेल, भू-राजनीतिक तनाव और वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता आने वाले दिनों में बाजार की दिशा को किस तरह प्रभावित करती है।

आगे बाजार की दिशा किन बातों पर निर्भर करेगी?

आने वाले कारोबारी सत्रों में निवेशकों की नजर मुख्य रूप से कच्चे तेल की कीमत, ईरान से जुड़े घटनाक्रम, विदेशी निवेशकों की गतिविधियों और वैश्विक बाजारों के रुख पर रहेगी।

हालांकि शुक्रवार की गिरावट ने बाजार में कुछ दबाव जरूर बनाया, लेकिन पूरे सप्ताह सेंसेक्स और निफ्टी की बढ़त यह दिखाती है कि व्यापक स्तर पर बाजार का प्रदर्शन अभी सकारात्मक रहा है। ऐसे में आने वाले दिनों में घरेलू और वैश्विक संकेतों के आधार पर बाजार में उतार-चढ़ाव जारी रह सकता है।

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