भारत में सोने और चांदी की कीमतों में शुक्रवार को गिरावट दर्ज की गई। घरेलू बाजार में यह कमजोरी मुख्य रूप से अंतरराष्ट्रीय बाजार से मिले कमजोर संकेतों की वजह से देखने को मिली। अमेरिकी डॉलर में आई रिकवरी के कारण कीमती धातुओं में हाल के दिनों की तेजी पर ब्रेक लग गया है। ऐसे में निवेशकों की नजर अब वैश्विक आर्थिक संकेतकों और अमेरिकी फेडरल रिजर्व की अगली रणनीति पर टिकी हुई है।
MCX पर सोना और चांदी दोनों फिसले
मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज (MCX) पर 5 अगस्त डिलीवरी वाला सोना वायदा लगभग 0.79% की गिरावट के साथ ₹1.42 लाख प्रति 10 ग्राम के करीब कारोबार करता दिखाई दिया।
वहीं, 4 सितंबर डिलीवरी वाली चांदी का वायदा भाव करीब ₹2,400 यानी लगभग 1% टूटकर ₹2.18 लाख प्रति किलोग्राम के नीचे पहुंच गया।
अंतरराष्ट्रीय बाजार का भी यही हाल
ग्लोबल मार्केट में भी कीमती धातुओं पर दबाव बना रहा। COMEX Gold Futures करीब 0.39% गिरकर 4,144.40 डॉलर प्रति औंस पर पहुंच गया, जबकि COMEX Silver Futures लगभग 0.22% टूटकर 58.89 डॉलर प्रति औंस पर कारोबार करता नजर आया।
पिछले कारोबारी सत्र में एक सप्ताह के उच्च स्तर पर पहुंचने के बाद स्पॉट गोल्ड में भी मुनाफावसूली देखने को मिली, जिससे कीमतों में हल्की नरमी आई।
आखिर क्यों आई कीमतों में गिरावट?
घरेलू बाजार में कमजोरी की सबसे बड़ी वजह वैश्विक बाजार का रुख रहा। सप्ताह की शुरुआत में तेजी के बाद अमेरिकी डॉलर ने निचले स्तर से वापसी की, जिससे सोने और चांदी पर दबाव बढ़ गया।
आमतौर पर जब डॉलर मजबूत होता है, तब दूसरी मुद्राओं में निवेश करने वालों के लिए सोना और चांदी महंगे हो जाते हैं। इससे इनकी मांग पर असर पड़ता है और कीमतों में गिरावट देखने को मिलती है।
इसके अलावा, अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों में कोई बदलाव नहीं करने के फैसले के बाद हालिया तेजी में निवेशकों ने मुनाफावसूली भी की, जिसने गिरावट को और बढ़ाया।
गिरावट के बावजूद सोने को मिल रहा है मजबूत सपोर्ट
हालांकि मौजूदा कमजोरी के बावजूद सोने की लंबी अवधि की तस्वीर अभी भी सकारात्मक बनी हुई है। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि यह धातु पिछले पांच महीनों की पहली मासिक बढ़त दर्ज करने की दिशा में बनी हुई है।
इसकी वजह अमेरिकी मौद्रिक नीति को लेकर नरम उम्मीदें और मध्य-पूर्व में बढ़ता भू-राजनीतिक तनाव है। ऐसे माहौल में निवेशक सुरक्षित निवेश (Safe Haven) के तौर पर सोने को प्राथमिकता देते हैं।
हाल के अमेरिकी आर्थिक आंकड़ों ने भी संकेत दिए हैं कि फेडरल रिजर्व भविष्य में ब्याज दरों को लेकर अधिक सतर्क रुख अपना सकता है। हालांकि मजबूत डॉलर और बढ़ती बॉन्ड यील्ड फिलहाल सोने की तेजी को सीमित कर रहे हैं।
निवेशकों के लिए क्या है रणनीति?
कोटक सिक्योरिटीज की कमोडिटी रिसर्च टीम की AVP कायनात चेनवाला के अनुसार, फिलहाल सोना और चांदी सीमित दायरे में कारोबार कर रहे हैं।
उनका कहना है कि कमजोर अमेरिकी आर्थिक आंकड़े कीमती धातुओं को सपोर्ट दे रहे हैं, लेकिन मजबूत डॉलर, ऊंची बॉन्ड यील्ड और फेडरल रिजर्व का सख्त रुख बड़ी तेजी आने से रोक रहा है। इसके बावजूद दोनों धातुएं कई महीनों में पहली मासिक बढ़त दर्ज करने की स्थिति में हैं।
भारतीय खरीदारों पर क्या पड़ेगा असर?
भारत में सोने और चांदी की कीमतें केवल अंतरराष्ट्रीय बाजार से ही तय नहीं होतीं। इन पर अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपये की चाल, आयात शुल्क, परिवहन लागत और घरेलू मांग का भी असर पड़ता है।
यही कारण है कि वैश्विक बाजार में होने वाले बदलावों का सीधा प्रभाव भारतीय बाजार में भी देखने को मिलता है, हालांकि स्थानीय मांग और रुपये की मजबूती या कमजोरी कीमतों में अतिरिक्त उतार-चढ़ाव ला सकती है।
भारत में सोने की मांग का क्या है हाल?
अप्रैल से जून तिमाही के दौरान देश में सोने की फिजिकल डिमांड में सालाना आधार पर करीब 6% की कमी दर्ज की गई। ऊंची कीमतों के कारण कई उपभोक्ताओं ने खरीदारी टाल दी।
हालांकि, वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के अनुसार, कुल उपभोक्ता खर्च रिकॉर्ड स्तर पर बना रहा क्योंकि महंगे दामों के बावजूद खरीदारों ने अधिक मूल्य का सोना खरीदा। वहीं, शादी और त्योहारों के सीजन की तैयारी के चलते पिछली तिमाही की तुलना में ज्वैलरी की मांग में सुधार भी देखने को मिला।
आगे किन संकेतों पर रहेगी बाजार की नजर?
अब निवेशकों की निगाह अमेरिका से आने वाले यूनिवर्सिटी ऑफ मिशिगन कंज्यूमर सेंटीमेंट और महंगाई उम्मीदों (Inflation Expectations) के आंकड़ों पर रहेगी। इन आंकड़ों से फेडरल रिजर्व की भविष्य की ब्याज दर नीति को लेकर अहम संकेत मिल सकते हैं।
इसके अलावा, अमेरिकी डॉलर की चाल, ट्रेजरी बॉन्ड यील्ड और पश्चिम एशिया के भू-राजनीतिक घटनाक्रम आने वाले दिनों में सोने और चांदी की कीमतों की दिशा तय करने वाले प्रमुख कारक बने रहेंगे।