भारतीय रुपया लगातार कमजोरी की ओर बढ़ रहा है और अमेरिकी डॉलर के मुकाबले नए रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया है. शुक्रवार को रुपया 11 पैसे टूटकर 95.87 प्रति डॉलर पर खुला, जबकि कारोबार के दौरान यह 96.14 प्रति डॉलर तक फिसल गया. इससे एक दिन पहले गुरुवार को भी रुपया 95.95 के ऐतिहासिक निचले स्तर तक पहुंच चुका था. विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में तेजी, कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें, विदेशी निवेशकों की बिकवाली और मिडिल ईस्ट में जारी तनाव ने भारतीय करेंसी पर दबाव बढ़ा दिया है.
वैश्विक स्तर पर जब आर्थिक अनिश्चितता या भू-राजनीतिक संकट बढ़ता है, तब निवेशक सुरक्षित निवेश विकल्पों की तलाश करते हैं. ऐसे समय में अमेरिकी डॉलर को सबसे भरोसेमंद करेंसी माना जाता है, जिसके चलते इसकी मांग तेजी से बढ़ जाती है. डॉलर मजबूत होने का सीधा असर भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राओं पर पड़ता है और रुपया कमजोर होने लगता है.
इसके अलावा अमेरिका में ऊंची ब्याज दरें भी भारतीय रुपये के लिए चिंता बढ़ा रही हैं. ज्यादा रिटर्न मिलने के कारण विदेशी निवेशक भारत सहित कई इमरजिंग मार्केट्स से पैसा निकालकर अमेरिकी बाजारों की ओर रुख कर रहे हैं. जब विदेशी निवेशक भारतीय शेयर और बॉन्ड बाजार से पैसा निकालते हैं, तो वे रुपये बेचकर डॉलर खरीदते हैं. इससे डॉलर की मांग और बढ़ जाती है और रुपया लगातार दबाव में आ जाता है.
कच्चे तेल की महंगाई भी रुपये की कमजोरी की बड़ी वजह बन रही है. सोमवार को ब्रेंट क्रूड की कीमत करीब 111 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बनी हुई है. भारत अपनी लगभग 90 फीसदी तेल जरूरतों के लिए आयात पर निर्भर है, इसलिए तेल महंगा होने से देश का आयात बिल तेजी से बढ़ता है. इसका असर सीधे तौर पर रुपये की कीमत और देश की महंगाई पर पड़ता है.
कमजोर रुपये का असर आम लोगों की जेब पर भी दिखाई दे सकता है. पेट्रोल-डीजल, इलेक्ट्रॉनिक्स सामान, मोबाइल, लैपटॉप, दवाइयां और अन्य आयातित वस्तुएं महंगी हो सकती हैं. इससे घरेलू महंगाई बढ़ने का खतरा रहता है. हालांकि, आईटी और एक्सपोर्ट से जुड़े कुछ सेक्टर्स को कमजोर रुपये से फायदा मिल सकता है, क्योंकि विदेशों से मिलने वाली कमाई रुपये में बदलने पर ज्यादा हो जाती है.