अयोध्या के राम मंदिर में कथित चढ़ावा और दान से जुड़ा मामला लगातार तूल पकड़ता जा रहा है। हर दिन इस विवाद में नए दावे सामने आ रहे हैं। अब रोकड़िया हनुमान मंदिर के महंत आचार्य विनोद मिश्रा ने कुछ नए और गंभीर आरोप लगाए हैं, जिन्होंने पूरे मामले को और पेचीदा बना दिया है।
चांदी का हार और चरण पादुका दान का दावा
महंत आचार्य विनोद मिश्रा के अनुसार, उनके शिष्य और मुंबई में व्यवसाय करने वाले अजय विश्वकर्मा ने रामलला के श्रृंगार के लिए विशेष दान दिया था। बताया गया कि 30 अक्टूबर 2025 को उन्होंने करीब 3 किलो चांदी का हार और लगभग 1 किलो वजन की 64 दिव्य चिन्हों से सजी चरण पादुका रामलला को अर्पित की थी।
आरोप है कि इस दान के बावजूद श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की ओर से कोई आधिकारिक रसीद जारी नहीं की गई।
मंदिर प्रबंधन पर गंभीर आरोप
महंत का कहना है कि उस समय मंदिर परिसर में मौजूद रमाशंकर उर्फ टिन्नू यादव ने दान सामग्री को स्वीकार किया और उसे आगे पुजारी तक पहुंचाया। पुजारी ने उन वस्तुओं को भगवान श्रीराम के चरणों में समर्पित किया, लेकिन बाद में कथित तौर पर पैकेट वापस ले लिया गया और उसे सुरक्षित रख लिया गया।
इसके बाद दानदाता को प्रसाद तो दिया गया, लेकिन रसीद देने को लेकर सिर्फ आश्वासन ही मिला। बताया गया कि उन्हें कहा गया था कि जांच के बाद रसीद जारी की जाएगी।
VVIP दर्शन और प्रशासनिक भूमिका का दावा
महंत के अनुसार, टिन्नू यादव उस समय मंदिर प्रशासन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे थे और चंपत राय की ओर से उन्हें अंदरूनी जिम्मेदारियां दी गई थीं। इसी वजह से उन्हें VVIP व्यवस्था के तहत दर्शन भी करवाया गया था।
परिवार को सीधे गर्भगृह तक ले जाने की बात भी सामने आई है, जहां कुछ समय के लिए दान की वस्तुएं भगवान के चरणों में रखी गईं।
200 किलोमीटर पैदल यात्रा का दावा
जानकारी के अनुसार, यह श्रद्धालु परिवार अपने गांव जैनपुर से लगभग 200 किलोमीटर की पदयात्रा करते हुए अयोध्या पहुंचा था। इस यात्रा में महिलाएं और बच्चे भी शामिल थे। बताया जाता है कि कठिन यात्रा के दौरान बच्चों के पैरों में छाले तक पड़ गए थे, लेकिन उनका उत्साह कम नहीं हुआ।
परिवार ने भजन-कीर्तन करते हुए मंदिर तक पहुंचकर दान की प्रक्रिया पूरी की थी।
रसीद और दान की स्थिति पर सवाल
महंत का आरोप है कि 8 महीने बीत जाने के बावजूद दानदाता को रसीद नहीं दी गई है। वहीं, यह भी दावा किया जा रहा है कि दान में मिली चांदी को बाद में गलाकर किसी अन्य रूप में इस्तेमाल किया गया।
इस पूरे मामले पर अभी तक मंदिर प्रशासन या ट्रस्ट की ओर से कोई विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, लेकिन विवाद लगातार गहराता जा रहा है।