थार की बंजर धरती में सुमेर सिंह ने भरी हरियाली की नई उम्मीद, 10 हजार हेक्टेयर जमीन को बचाया

Saroj kanwar
5 Min Read

राजस्थान के थार रेगिस्तान की पहचान आमतौर पर रेत के विशाल टीलों और सूखे इलाकों से होती है। लेकिन इसी मरुस्थलीय क्षेत्र में कुछ ऐसे प्राकृतिक घास के मैदान भी हैं, जो पशुओं, वन्यजीवों और स्थानीय समुदायों के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं। इन्हीं ओरण और पारंपरिक चरागाहों के संरक्षण के लिए जैसलमेर के ऊंट पालक सुमेर सिंह भाटी लंबे समय से प्रयास कर रहे हैं।

सुमेर सिंह भाटी ने स्थानीय ग्रामीणों को साथ लेकर इन प्राकृतिक क्षेत्रों को बचाने की मुहिम शुरू की। उनका प्रयास सिर्फ पर्यावरण संरक्षण तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे पशुपालकों की आजीविका और थार की जैव विविधता को भी मजबूती मिली है।

खत्म होते ओरण को बचाने की पहल

जैसलमेर निवासी सुमेर सिंह भाटी पारंपरिक रूप से ऊंट पालन से जुड़े हुए हैं। उन्होंने अपने आसपास के इलाकों में देखा कि समय के साथ ओरण यानी सामुदायिक और पारंपरिक चरागाह क्षेत्र लगातार प्रभावित हो रहे हैं। इन इलाकों के कमजोर होने का सीधा असर पशुओं के लिए उपलब्ध चारे, प्राकृतिक जल स्रोतों और वन्यजीवों पर पड़ सकता था।

इसी चिंता को देखते हुए उन्होंने ग्रामीणों को जागरूक करना शुरू किया और अधिक से अधिक लोगों को संरक्षण अभियान से जोड़ने का प्रयास किया।

20 गांवों को जोड़ा, निकाली ‘सेव ओरण पदयात्रा’

ओरण संरक्षण की मुहिम को व्यापक स्तर तक पहुंचाने के लिए सुमेर सिंह भाटी ने करीब 20 गांवों के लोगों को एकजुट किया। उन्होंने ग्रामीणों को इन प्राकृतिक चरागाहों के पर्यावरणीय और सामाजिक महत्व के बारे में समझाया।

लोगों तक संदेश पहुंचाने के लिए उन्होंने जैसलमेर से जयपुर तक ‘सेव ओरण पदयात्रा’ भी निकाली। इस यात्रा का उद्देश्य ओरण क्षेत्रों के संरक्षण को लेकर जागरूकता बढ़ाना और ज्यादा लोगों को इस अभियान से जोड़ना था।

उनके प्रयासों से देगराई माता ओरण के लगभग 10,000 हेक्टेयर क्षेत्र को बचाने में मदद मिली। संरक्षण के बाद इलाके में घास और प्राकृतिक जल स्रोतों की स्थिति में भी सुधार देखने को मिला।

थार के पारिस्थितिकी तंत्र में ऊंटों की अहम भूमिका

थार में ऊंट केवल परिवहन या पशुपालन का साधन नहीं हैं, बल्कि वे स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र का भी महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। ऊंट चराई के दौरान वनस्पतियों के बीजों को अलग-अलग स्थानों तक पहुंचाने में योगदान देते हैं। इससे प्राकृतिक वनस्पतियों के फैलाव में मदद मिलती है।

ओरण और घास के मैदानों के संरक्षण से ऊंटों के साथ-साथ भेड़ और बकरियों के लिए भी चराई के क्षेत्र उपलब्ध हुए। इसका सीधा लाभ उन परिवारों को मिला, जिनकी रोजी-रोटी पशुपालन पर निर्भर है।

गोडावण और कैराकल जैसे वन्यजीवों के संरक्षण में योगदान

सुमेर सिंह भाटी की संरक्षण यात्रा केवल चरागाहों तक सीमित नहीं रही। उन्होंने थार की जैव विविधता और दुर्लभ वन्यजीवों के संरक्षण के लिए भी काम किया है।

उन्होंने गोडावण यानी ग्रेट इंडियन बस्टर्ड जैसे दुर्लभ पक्षी के संरक्षण की दिशा में प्रयास किए। इसके अलावा जैसलमेर क्षेत्र में पाई जाने वाली दुर्लभ जंगली बिल्ली कैराकल की पहचान और संरक्षण से जुड़े प्रयासों में भी उनका योगदान रहा है।

इस तरह ओरण संरक्षण की उनकी पहल ने थार के प्राकृतिक आवासों के साथ-साथ वहां मौजूद वन्यजीवों के लिए भी बेहतर परिस्थितियां तैयार करने में मदद की।

रेगिस्तान से मिली पर्यावरण संरक्षण की बड़ी सीख

सुमेर सिंह भाटी की कहानी यह संदेश देती है कि पर्यावरण संरक्षण का मतलब केवल पेड़ लगाना नहीं है। घास के मैदान, पारंपरिक चरागाह, ओरण और प्राकृतिक जल स्रोत भी किसी क्षेत्र के पर्यावरण के लिए बेहद जरूरी होते हैं।

ऐसे प्राकृतिक क्षेत्र स्थानीय जैव विविधता को बनाए रखने, जल संसाधनों के संरक्षण और पारिस्थितिकी तंत्र को संतुलित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। साथ ही, इनका संरक्षण पशुपालक समुदायों की आजीविका के लिए भी जरूरी है।

थार में सुमेर सिंह भाटी और ग्रामीणों की सामूहिक कोशिश दिखाती है कि स्थानीय लोग अगर अपने प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा के लिए एकजुट हों, तो कठिन परिस्थितियों वाले रेगिस्तानी इलाकों में भी सकारात्मक बदलाव संभव है।

TAGGED:
Share This Article
Leave a comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *