UAE को पीछे छोड़ अमेरिका बना भारत का सबसे बड़ा LPG सप्लायर, कैसे हुआ ये? समझिए पूरी कहानी

Saroj kanwar
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भारत की ऊर्जा आपूर्ति व्यवस्था में हाल के महीनों में एक बड़ा और अहम बदलाव देखने को मिला है। जहां पहले देश की LPG (रसोई गैस) जरूरतों का अधिकांश हिस्सा खाड़ी देशों से पूरा होता था, वहीं अब अमेरिका इस क्षेत्र में सबसे आगे निकल गया है। यह बदलाव सिर्फ व्यापारिक नहीं, बल्कि भारत की ऊर्जा सुरक्षा रणनीति में एक बड़ा मोड़ भी माना जा रहा है।


पहले भारत किन देशों पर निर्भर था?

भारत दुनिया के सबसे बड़े LPG उपभोक्ताओं में से एक है। देश की कुल LPG खपत का लगभग 65% हिस्सा आयात से पूरा होता है, जबकि सालाना मांग करीब 3.3 करोड़ टन तक पहुंचती है।

पहले भारत की LPG सप्लाई का लगभग 90% हिस्सा पश्चिम एशिया (मिडिल ईस्ट) से आता था। इसमें प्रमुख रूप से शामिल थे:

  • सऊदी अरब
  • संयुक्त अरब अमीरात (UAE)
  • कतर
  • कुवैत

भौगोलिक नजदीकी और कम ट्रांसपोर्ट लागत के कारण यह सप्लाई मॉडल लंबे समय तक सबसे सुविधाजनक माना जाता था।


क्या बदला और क्यों बदला?

फरवरी 2026 के आसपास मिडिल ईस्ट क्षेत्र में तनाव बढ़ने लगा। इसके साथ ही स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज (Strait of Hormuz) में समुद्री व्यापार को लेकर जोखिम भी काफी बढ़ गया।

यह वही अहम समुद्री मार्ग है जिससे खाड़ी देशों का तेल और गैस दुनिया के विभिन्न हिस्सों तक पहुंचता है। संभावित बाधाओं के कारण भारत के सामने दो बड़ी चुनौतियां खड़ी हो गईं:

  • LPG सप्लाई बाधित होने का खतरा
  • घरेलू मांग को लगातार पूरा रखने की मजबूरी

चूंकि भारत में करोड़ों परिवार खाना पकाने के लिए LPG पर निर्भर हैं, इसलिए सरकार के लिए यह एक गंभीर स्थिति बन गई।


अमेरिका कैसे बना सबसे बड़ा LPG सप्लायर?

सप्लाई जोखिम को कम करने के लिए भारत ने तुरंत वैकल्पिक स्रोतों की तलाश शुरू की। इसी दौरान अमेरिका की भूमिका तेजी से बढ़ी।

मार्च 2026 से भारत ने अमेरिका से बड़े पैमाने पर स्पॉट खरीद शुरू की। शुरुआती आंकड़ों में ही अमेरिका ने लगभग 4.35 लाख टन LPG भारत को निर्यात की, जिससे वह पहली बार सबसे बड़ा सप्लायर बन गया।

इसके बाद:

  • अमेरिका लगातार शीर्ष सप्लायर बना रहा
  • UAE दूसरे स्थान पर खिसक गया
  • अन्य खाड़ी देशों की हिस्सेदारी घटती चली गई

रिपोर्ट्स के अनुसार, जून 2026 तक अमेरिका से आयात 10 लाख टन से अधिक पहुंचने का अनुमान है, जो एक रिकॉर्ड स्तर माना जा रहा है।


क्या यह बदलाव पहले से तय था?

यह बदलाव पूरी तरह योजनाबद्ध नहीं था। हालांकि 2025 के अंत में भारत और अमेरिका के बीच लगभग 22 लाख टन प्रति वर्ष LPG आपूर्ति का समझौता हुआ था।

उस समय लक्ष्य था कि अमेरिका की हिस्सेदारी कुल आयात का लगभग 10% तक पहुंचे, लेकिन मिडिल ईस्ट संकट ने इस प्रक्रिया को काफी तेज कर दिया।

अप्रैल 2026 तक अमेरिका की हिस्सेदारी बढ़कर लगभग एक-तिहाई तक पहुंच गई, जबकि कुछ महीने पहले यह केवल 8% के आसपास थी।


भारत किन नए देशों से भी LPG खरीद रहा है?

सप्लाई को विविध बनाने के लिए भारत ने अन्य देशों से भी खरीद बढ़ाई है। इनमें शामिल हैं:

  • अर्जेंटीना
  • चिली
  • फ्रांस
  • नीदरलैंड
  • ईरान (आंशिक रूप से वापसी)

इस बदलाव से भारत की निर्भरता केवल खाड़ी देशों तक सीमित नहीं रही।


इस बदलाव के फायदे क्या हैं?

1. सप्लाई सुरक्षा मजबूत हुई

भारत को अचानक कमी या संकट का सामना नहीं करना पड़ा।

2. आयात स्रोतों में विविधता

अब देश किसी एक क्षेत्र पर पूरी तरह निर्भर नहीं है।

3. ऊर्जा सुरक्षा में सुधार

वैश्विक संकट की स्थिति में भी वैकल्पिक सप्लाई उपलब्ध रहती है।


लेकिन नुकसान भी कम नहीं हैं

1. लागत में बढ़ोतरी

अमेरिका से LPG की कीमत अक्सर अधिक पड़ती है।

2. लंबी दूरी का ट्रांसपोर्ट

अमेरिका से भारत तक शिपिंग दूरी अधिक होने से खर्च बढ़ जाता है।

3. डिलीवरी समय ज्यादा

लॉजिस्टिक्स समय बढ़ने से कुल लागत पर असर पड़ता है।


आगे की स्थिति क्या हो सकती है?

अगर मिडिल ईस्ट में हालात सामान्य रहते हैं, तो खाड़ी देशों से आपूर्ति फिर से बढ़ सकती है। हालांकि विशेषज्ञों के अनुसार भारत अब पूरी तरह पुराने मॉडल पर वापस नहीं जाएगा।

आने वाले समय में भारत संभवतः:

  • अमेरिका
  • खाड़ी देश
  • अफ्रीका
  • और अन्य उत्पादक देशों

से संतुलित आयात नीति अपनाएगा।


निष्कर्ष

मिडिल ईस्ट संकट ने भारत की ऊर्जा रणनीति को एक नया दिशा दी है। जहां पहले देश मुख्य रूप से खाड़ी देशों पर निर्भर था, वहीं अब अमेरिका एक प्रमुख LPG सप्लायर के रूप में उभर चुका है।

यह बदलाव सिर्फ व्यापारिक नहीं, बल्कि भारत की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने की एक लंबी अवधि की रणनीति का हिस्सा बनता जा रहा है।

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