कमजोर मानसून के अनुमान के बीच खरीफ सीजन में मूंगफली की खेती किसानों के लिए एक बेहतर विकल्प बनकर उभर रही है। सरकार भी “खेत बचाओ अभियान” के तहत कम बारिश की स्थिति को देखते हुए किसानों को ऐसी फसलों की ओर रुख करने की सलाह दे रही है, जिनमें पानी की जरूरत कम होती है।
इसी दिशा में पंजाब कृषि विश्वविद्यालय (PAU) भी सक्रिय भूमिका निभा रहा है। संस्थान गांव-गांव जाकर किसानों को मक्के के बजाय मूंगफली की खेती अपनाने के लिए प्रेरित कर रहा है। पंजाब जैसे राज्यों में धान की अधिक खेती से भूजल स्तर पर लगातार दबाव बढ़ रहा है। ऐसे में मूंगफली जैसी फसलें जल संरक्षण में मददगार साबित हो सकती हैं।
कम पानी में बेहतर मुनाफे वाली फसल
विशेषज्ञों का मानना है कि मूंगफली एक कम लागत और कम जल-आवश्यकता वाली फसल है। मौजूदा खरीफ सीजन में बारिश कम होने की संभावना के चलते किसानों को सिंचाई के लिए बिजली और डीजल पर अधिक खर्च करना पड़ सकता है। ऐसे हालात में मूंगफली की खेती आर्थिक रूप से अधिक फायदेमंद मानी जा रही है।
मिट्टी की सेहत के लिए भी लाभकारी
मूंगफली की खेती सिर्फ आय ही नहीं बढ़ाती, बल्कि खेत की मिट्टी की गुणवत्ता में भी सुधार करती है। यह फसल प्राकृतिक रूप से नाइट्रोजन स्थिरीकरण करती है, जिससे भूमि की उर्वरता बढ़ती है और अगले सीजन की फसलों को भी फायदा मिलता है।
मक्का से कम लागत, ज्यादा बचत
किसानों के अनुभव के अनुसार, मूंगफली की खेती में मक्के की तुलना में लगभग 40 से 50 प्रतिशत तक कम लागत आती है। इसी वजह से यह फसल छोटे और मध्यम किसानों के लिए एक आकर्षक विकल्प बनती जा रही है।
उत्पादन कितना मिलता है?
जानकारों के मुताबिक, मूंगफली की उन्नत किस्म J-87 अच्छी उपज देने के लिए जानी जाती है। वसंत ऋतु में इसकी औसत उपज लगभग 15.8 क्विंटल प्रति एकड़ तक पहुंच सकती है, जबकि खरीफ सीजन में यह करीब 12.8 क्विंटल प्रति एकड़ तक उत्पादन दे सकती है।
कुल मिलाकर, कम बारिश की चुनौती के बीच मूंगफली की खेती किसानों के लिए कम लागत, कम पानी और बेहतर मुनाफे का संतुलित विकल्प बनती दिख रही है।