वॉशिंगटन: अमेरिका की वायुसेना की ताकत माने जाने वाले F-35 Lightning II फाइटर जेट इन दिनों गंभीर तकनीकी और मेंटेनेंस समस्याओं से जूझ रहे हैं। हालात इतने चिंताजनक बताए जा रहे हैं कि अगर ताइवान को लेकर चीन के साथ कोई बड़ा सैन्य टकराव होता है, तो अमेरिका की रणनीतिक बढ़त पर असर पड़ सकता है।
हाल ही में अमेरिकी सरकार की जवाबदेही संस्था Government Accountability Office (GAO) की रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि F-35 बेड़े की फुल मिशन-कैपेबल (FMC) दर लगातार गिरती जा रही है। वर्ष 2021 में यह दर लगभग 38% थी, जो अब घटकर सिर्फ 25% रह गई है। इसका अर्थ है कि हर चार में से केवल एक F-35 विमान ही पूरी तरह युद्ध अभियानों के लिए तैयार है।
फ्लीट की तैयारी में लगातार गिरावट
रिपोर्ट के अनुसार, पहले जहां लगभग 67% विमान किसी न किसी मिशन के लिए तैयार रहते थे, वहीं अब यह आंकड़ा गिरकर करीब 44% तक पहुंच गया है। इसका मतलब है कि बड़ी संख्या में विमान या तो मरम्मत में हैं या पूरी तरह ऑपरेशनल नहीं हैं।
मिलिट्री विशेषज्ञों का कहना है कि मौजूदा हालात में अगर ताइवान को लेकर कोई संघर्ष होता है, तो चीन के खिलाफ प्रभावी एयर ऑपरेशन चलाना अमेरिका के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
मेंटेनेंस और सप्लाई चेन बनी बड़ी समस्या
विशेषज्ञों के मुताबिक इस संकट की मुख्य वजह लंबे समय से चल रही सप्लाई चेन बाधाएं और मेंटेनेंस सिस्टम की कमजोर निगरानी है। कई जरूरी पार्ट्स समय पर उपलब्ध नहीं हो पा रहे हैं, जिसके कारण सैकड़ों विमान हैंगरों में खड़े रह जाते हैं।
इसके अलावा, अमेरिकी सेना का F-35 रखरखाव काफी हद तक निजी रक्षा कंपनी Lockheed Martin पर निर्भर है। सरकारी स्तर पर मजबूत रिपेयर इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी भी एक बड़ी चुनौती बनकर उभरी है।
तकनीकी अपग्रेड में देरी से बढ़ी परेशानी
F-35 के नए वर्जन और अपग्रेड, जैसे Technology Refresh 3, में लगातार देरी और तकनीकी खामियां सामने आ रही हैं। इससे नए विमान भी समय पर पूरी क्षमता के साथ सेवा में नहीं आ पा रहे हैं।
अमेरिकी वायुसेना के लिए चिंता इसलिए भी बढ़ गई है क्योंकि F-35 को आधुनिक युद्ध रणनीति में बेहद अहम माना जाता है, खासकर दुश्मन की एयर डिफेंस सिस्टम को निष्क्रिय करने (SEAD) की क्षमता के कारण।
रणनीतिक प्रभाव पर सवाल
रिपोर्टों के अनुसार, यदि F-35 की उपलब्धता इसी तरह प्रभावित रहती है, तो अमेरिका को सीमित संख्या में ही पूरी तरह तैयार लड़ाकू विमान मिल पाएंगे, जिनमें F-15, F-16 और F-35 शामिल हैं।
विशेषज्ञ यह भी चेतावनी दे रहे हैं कि यदि F-35 की क्षमता प्रभावित होती है, तो चीन जैसे देशों के उन्नत एयर डिफेंस सिस्टम के खिलाफ अमेरिकी चौथी पीढ़ी के लड़ाकू विमान प्रभावी साबित नहीं हो पाएंगे।
भारत से जुड़ा पहलू
पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत को F-35 खरीदने का प्रस्ताव दिया था, लेकिन भारत की ओर से इस पर कोई आधिकारिक रुचि नहीं दिखाई गई। माना जाता है कि भारत ने यह निर्णय रणनीतिक निर्भरता और लंबी अवधि की मेंटेनेंस चुनौतियों को देखते हुए लिया था।
वर्तमान हालात को देखते हुए, विशेषज्ञों का कहना है कि F-35 की परिचालन चुनौतियां केवल तकनीकी नहीं हैं, बल्कि यह अमेरिका की भविष्य की एयर पावर रणनीति पर भी बड़ा सवाल खड़ा करती हैं।