नई दिल्ली, ब्रह्मानंद मिश्र। कुछ समय पहले सोशल मीडिया पर एक ट्रेंड तेजी से वायरल हुआ था—“बालों को फिर से उगाने” और “हेयर फॉलिकल्स को मजबूत करने” का दावा करने वाला आदिवासी हेयर ऑयल। इंस्टाग्राम रील्स से लेकर यूट्यूब वीडियो तक, कई सेलिब्रिटी और इन्फ्लुएंसर इस प्रोडक्ट को प्रमोट करते नजर आए। लेकिन बाद में सामने आया कि इनमें से कई लोगों ने वास्तव में इसका इस्तेमाल ही नहीं किया था, और उपयोगकर्ताओं की प्रतिक्रियाएं अधिकतर निराशाजनक रहीं।
ऐसा केवल एक उदाहरण नहीं है। आजकल विटामिन सप्लीमेंट्स, इम्युनिटी बूस्टर पाउडर, शुगर-फ्री स्वीटनर्स और लो-कैलोरी पैकेज्ड फूड्स जैसे कई उत्पादों को सोशल मीडिया पर बड़े-बड़े दावों के साथ पेश किया जा रहा है। फिटनेस और वेलनेस इंडस्ट्री को डिजिटल क्रिएटर्स ने एक ग्लैमरस दुनिया में बदल दिया है, जहां वजन घटाने से लेकर बेहतर नींद, तनाव कम करने और ब्लड शुगर कंट्रोल जैसे हर सवाल का “तुरंत समाधान” मौजूद दिखता है।
सोशल मीडिया पर बढ़ता हेल्थ कंटेंट और भरोसे का संकट
आज लाखों फॉलोअर्स वाले इन्फ्लुएंसर न केवल जीवनशैली बल्कि लोगों के स्वास्थ्य संबंधी फैसलों को भी प्रभावित कर रहे हैं। समस्या यह है कि इनमें से कई लोग डॉक्टर, डेंटिस्ट या प्रमाणित मेडिकल प्रोफेशनल नहीं होते। वे खुद को “फिटनेस कोच”, “डाइट एक्सपर्ट” या “लाइफस्टाइल गाइड” के रूप में प्रस्तुत करते हैं।
चिंताजनक बात यह है कि कुछ इन्फ्लुएंसर अपने व्यक्तिगत अनुभवों को सार्वभौमिक समाधान की तरह पेश करते हैं। वजन घटाने या गंभीर बीमारियों से ठीक होने जैसे दावे वायरल होकर लोगों का भरोसा जीत लेते हैं। लेकिन किसी एक व्यक्ति का अनुभव हर किसी पर लागू हो, यह जरूरी नहीं है।
इसी तरह सनस्क्रीन से कैंसर होने या निकोटीन से अल्जाइमर ठीक होने जैसे बिना आधार वाले दावे भी तेजी से फैलते हैं और लाखों व्यूज़ हासिल कर लेते हैं। इसके विपरीत, डॉक्टरों और वैज्ञानिकों की चेतावनियां अक्सर कम आकर्षक लगती हैं और लोग उन्हें नजरअंदाज कर देते हैं।
क्यों इतना प्रभाव डालते हैं हेल्थ इन्फ्लुएंसर?
फिटनेस और न्यूट्रिशन से जुड़े कंटेंट क्रिएटर्स का प्रभाव लगातार बढ़ रहा है। इनमें से अधिकतर के पास औपचारिक मेडिकल डिग्री नहीं होती, फिर भी वे खुद को विशेषज्ञ के रूप में प्रस्तुत करते हैं।
इनका असर सिर्फ खरीदारी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि अब ये लोगों की सोच, आदतों और जीवनशैली के निर्णयों को भी प्रभावित कर रहे हैं। लाखों फॉलोअर्स होने के कारण इनकी सलाह लोगों को अधिक भरोसेमंद लगने लगती है, भले ही वह वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित न हो।
कई बार व्यक्तिगत सफलता की कहानियां लोगों को आकर्षित करती हैं, लेकिन यह समझना जरूरी है कि हर शरीर, हर स्वास्थ्य स्थिति और हर जीवनशैली अलग होती है।
हेल्थ हाइप और वास्तविकता के बीच बढ़ती खाई
एक बड़ी समस्या यह भी है कि कुछ योग्य डॉक्टर और हेल्थ एक्सपर्ट्स बेहतर कंटेंट बनाने के बावजूद सोशल मीडिया की तेज़ रफ्तार ट्रेंडिंग दुनिया में पीछे रह जाते हैं।
रिपोर्ट्स के अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में ऑनलाइन वेलनेस कंटेंट का बाजार काफी तेजी से बढ़ा है। एक अंतरराष्ट्रीय अध्ययन में पाया गया कि कई यूजर्स को लगता है कि इंटरनेट पर मिलने वाली स्वास्थ्य जानकारी और डॉक्टर की सलाह में काफी अंतर होता है।
सही जानकारी तक पहुंचने का तरीका
अगर किसी कारणवश डॉक्टर से सीधा संपर्क संभव न हो, तो केवल सोशल मीडिया रील्स या अनवेरिफाइड चैटबॉट्स पर निर्भर रहना सही विकल्प नहीं है। इसके बजाय टेलीमेडिसिन और टेलीहेल्थ सेवाओं का उपयोग किया जा सकता है, जहां मरीज वीडियो कॉल या ऑनलाइन चैट के माध्यम से विशेषज्ञों से सलाह ले सकते हैं।
इसके अलावा कई प्रमाणित हेल्थ प्लेटफॉर्म और मोबाइल एप्स भी उपलब्ध हैं, जो स्वास्थ्य मॉनिटरिंग, डाइट प्लान, दवा रिमाइंडर और वियरेबल डिवाइसेज़ के साथ इंटीग्रेशन जैसी सुविधाएं देते हैं।
विश्वसनीय जानकारी के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) जैसी संस्थाओं की वेबसाइट भी एक अच्छा स्रोत मानी जाती है।
स्वास्थ्य जानकारी को परखने के जरूरी नियम
ऑनलाइन किसी भी स्वास्थ्य जानकारी पर भरोसा करने से पहले कुछ बातों का ध्यान रखना जरूरी है—
- किसी भी दावे के दोनों पहलुओं को जरूर जांचें।
- जानकारी का मूल स्रोत और उसकी विश्वसनीयता समझें।
- देखें कि सलाह देने वाला व्यक्ति मेडिकल क्वालिफिकेशन रखता है या नहीं।
- किसी भी जानकारी को आगे शेयर करने से पहले उसके संभावित नुकसान पर विचार करें।
इंटरनेट जानकारी और वास्तविक इलाज में फर्क समझना जरूरी
डॉ. ज्योति मिश्रा (सीनियर कंसल्टेंट, साइकोलॉजी, अपोलो स्पेक्ट्रा हॉस्पिटल, दिल्ली) के अनुसार, इंटरनेट पर हर तरह की जानकारी तुरंत उपलब्ध होने के कारण लोग अब स्वास्थ्य, करियर और जीवन से जुड़े फैसलों में ऑनलाइन कंटेंट पर अधिक निर्भर हो रहे हैं। लेकिन यह जरूरी नहीं कि हर जानकारी वैज्ञानिक रूप से सही हो।
गलत या अधूरी जानकारी कई बार लोगों में चिंता, डर और भ्रम पैदा कर सकती है। सोशल मीडिया पर दिखने वाली “परफेक्ट लाइफ” की छवियां भी आत्म-संदेह और तनाव को बढ़ा सकती हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि इंटरनेट को केवल सामान्य जानकारी का माध्यम समझना चाहिए, न कि इलाज का विकल्प। लंबे समय तक मानसिक तनाव, नींद की समस्या या चिंता जैसी स्थितियों में विशेषज्ञ से सीधे सलाह लेना जरूरी है। साथ ही डिजिटल डिटॉक्स और वास्तविक सामाजिक संबंध मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाए रखने में मदद करते हैं।
निष्कर्ष
डिजिटल दुनिया में स्वास्थ्य संबंधी जानकारी की भरमार है, लेकिन हर जानकारी भरोसेमंद नहीं होती। जरूरी है कि लोग जागरूक रहें, तथ्यों की जांच करें और किसी भी ट्रेंडिंग सलाह को अपनाने से पहले सोच-समझकर निर्णय लें। स्वास्थ्य के मामले में सबसे सुरक्षित रास्ता हमेशा प्रमाणित विशेषज्ञों की सलाह ही है।