एनीमिया के इलाज में फोलिक एसिड के बराबर असरदार पाई गईं ये आयुर्वेदिक दवाएं, रिपोर्ट में खुलासा

Saroj kanwar
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नई दिल्ली: भारत में एनीमिया एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या बनी हुई है, खासकर महिलाओं में। इसी बीच एक बड़े क्लिनिकल अध्ययन में सामने आया है कि आयरन की कमी से होने वाले मध्यम एनीमिया के इलाज में कुछ आयुर्वेदिक औषधियां, पारंपरिक आयरन-फोलिक एसिड थेरेपी के बराबर प्रभाव दिखा सकती हैं।

यह अध्ययन Indian Council of Medical Research और Central Council for Research in Ayurvedic Sciences द्वारा संयुक्त रूप से किया गया एक मल्टी-सेंटर फेज-3 रैंडमाइज्ड कंट्रोल्ड ट्रायल (RCT) था।


4000 महिलाओं पर किया गया व्यापक क्लिनिकल ट्रायल

इस शोध में भारत भर की लगभग 4000 गैर-गर्भवती महिलाओं को शामिल किया गया, जिनकी उम्र 18 से 49 वर्ष के बीच थी और वे मध्यम स्तर के एनीमिया से पीड़ित थीं।

अध्ययन का उद्देश्य यह जांचना था कि क्या आयुर्वेदिक दवाएं पारंपरिक आयरन फोलिक एसिड सप्लीमेंट (IFA) जितनी प्रभावी हो सकती हैं या नहीं।


90 दिनों में हेमोग्लोबिन स्तर का मूल्यांकन

शोधकर्ताओं ने 90 दिनों की अवधि में प्रतिभागियों के हीमोग्लोबिन स्तर और अन्य स्वास्थ्य संकेतकों की निगरानी की।

परिणामों के अनुसार, पुनर्नवाड़ी मंडूर और द्राक्षावलेह जैसी आयुर्वेदिक दवाओं का प्रभाव, मानक आयरन-फोलिक एसिड थेरेपी के लगभग समान पाया गया। यह निष्कर्ष मध्यम एनीमिया के उपचार में एक महत्वपूर्ण वैकल्पिक विकल्प की संभावना को दर्शाता है।


आयुष और आधुनिक चिकित्सा के एकीकरण की दिशा में कदम

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार, यह अध्ययन भारत में इंटीग्रेटेड हेल्थकेयर और साक्ष्य-आधारित आयुर्वेदिक चिकित्सा को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है।

इस राष्ट्रीय स्तर के सम्मेलन में नीति निर्माताओं, वैज्ञानिकों, शोधकर्ताओं और चिकित्सा विशेषज्ञों ने हिस्सा लिया और क्लिनिकल रिसर्च सिस्टम को और मजबूत करने पर चर्चा की।


क्लिनिकल रिसर्च और रेगुलेशन पर नई रिपोर्ट भी जारी

इस कार्यक्रम के दौरान एक और महत्वपूर्ण रिपोर्ट भी पेश की गई, जिसका शीर्षक था— “भारत में फर्स्ट-इन-ह्यूमन फेज-1 क्लिनिकल ट्रायल्स को आगे बढ़ाने के लिए विनियामक मार्ग और अवसर”।

यह रिपोर्ट 37 विशेषज्ञों के सुझावों पर आधारित थी, जिसमें भारत में शुरुआती चरण के क्लिनिकल ट्रायल्स को आसान और अधिक प्रभावी बनाने पर जोर दिया गया।


मुख्य सिफारिशें और उद्देश्य

रिपोर्ट में कुछ प्रमुख सुझाव दिए गए, जिनमें शामिल हैं:

  • नियामक प्रक्रियाओं को सरल और तेज बनाना
  • विभिन्न एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय
  • नैतिक समीक्षा प्रणाली को मजबूत करना
  • क्लिनिकल रिसर्च में पारदर्शिता और गुणवत्ता बढ़ाना

इसके साथ ही बहु-केंद्र (multi-center) शोध के लिए एकीकृत नैतिक समीक्षा से जुड़े नए दिशानिर्देश भी जारी किए गए, ताकि पूरे देश में रिसर्च प्रक्रिया अधिक समान और प्रभावी हो सके।


निष्कर्ष

यह अध्ययन न केवल एनीमिया के उपचार के नए विकल्पों की संभावनाएं खोलता है, बल्कि भारत में आयुर्वेद और आधुनिक चिकित्सा के संयुक्त उपयोग की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

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