भारत-बांग्लादेश सीमा पर वर्षों से अटका हुआ फेंसिंग प्रोजेक्ट अब ज़मीन पर उतरता नजर आ रहा है। जलपाईगुड़ी के चांगराबांधा क्षेत्र में जमीन हस्तांतरण को मंजूरी मिलने के बाद सीमा सुरक्षा बल (BSF) ने सर्वे और पिलर लगाने की प्रक्रिया शुरू कर दी है।
पूरा मामला क्या है?
कूचबिहार जिले के चांगराबांधा इलाके में सीमा पर तारबंदी को लेकर एक बड़ा कदम उठाया गया है। BSF और भूमि सुधार विभाग के अधिकारियों ने संयुक्त निरीक्षण करते हुए पूरे क्षेत्र का मुआयना किया और फेंसिंग के लिए जमीन की माप व सीमांकन का काम शुरू किया।
सूत्रों के अनुसार, BSF ने आधिकारिक नक्शों की मदद से उन मार्गों की पहचान कर ली है, जहां से कांटेदार तार (barbed wire) की बाड़ लगाई जाएगी। इसके बाद चयनित जगहों पर पिलर लगाकर सीमाओं को स्पष्ट किया जा रहा है।
किन इलाकों में हुआ सर्वे?
यह सर्वे और निशानदेही मुख्य रूप से चांगराबांधा के पूर्वपाड़ा इलाके में की गई है, जहां लंबे समय से कोई फेंसिंग नहीं थी। इस दौरान स्थानीय लोग भी मौजूद रहे, क्योंकि प्रस्तावित बाड़बंदी में उनकी जमीन का कुछ हिस्सा शामिल हो रहा है।
‘चिकन नेक’ कॉरिडोर पर खास ध्यान
खास बात यह है कि ‘चिकन नेक’ कॉरिडोर के पास लगभग 4.5 किलोमीटर का इलाका अब तक बिना बाड़ के था। यह क्षेत्र सुरक्षा के लिहाज से बेहद संवेदनशील माना जाता है। यहां फेंसिंग न होने की वजह से घुसपैठ, पशु तस्करी और मानव तस्करी जैसी घटनाओं की शिकायतें समय-समय पर सामने आती रही हैं।
स्थानीय लोगों के अनुसार, जमीन विवाद और प्रशासनिक अड़चनों के चलते यह परियोजना लंबे समय से रुकी हुई थी।
अब क्यों बढ़ी गति?
जमीन हस्तांतरण की प्रक्रिया आगे बढ़ने के बाद प्रशासन ने फेंसिंग कार्य को तेज कर दिया है। अधिकारी यह भी तय कर रहे हैं कि किन हिस्सों में सड़क बनाई जाएगी और किन क्षेत्रों में तारबंदी की जाएगी।
सीमा सुरक्षा पर क्या असर होगा?
स्थानीय लोगों ने इस पहल का स्वागत किया है। उनका मानना है कि फेंसिंग पूरी होने के बाद अवैध घुसपैठ, तस्करी और सीमा पार होने वाले अपराधों में कमी आएगी, जिससे क्षेत्र में सुरक्षा और स्थिरता बढ़ेगी।
सीमा की बड़ी चुनौती
BSF के मुताबिक, नॉर्थ बंगाल फ्रंटियर के तहत भारत-बांग्लादेश सीमा की कुल लंबाई लगभग 936.4 किलोमीटर है। इसमें करीब 879 किलोमीटर भू-सीमा और लगभग 53 किलोमीटर नदी सीमा शामिल है। फिलहाल 100 किलोमीटर से ज्यादा क्षेत्र अभी भी बिना फेंसिंग के है, जिसकी वजह नदियां, नहरें और भूमि विवाद हैं।
भूमि विवाद और अधूरा काम
गौरतलब है कि 2015 के भारत-बांग्लादेश भूमि सीमा समझौते के बावजूद जलपाईगुड़ी के कई गांवों—बरसाशी, नाओटोरी देवोत्तर, परानीग्राम और चिलागाटी—में लोगों को अब तक पूरी तरह से जमीन के अधिकार नहीं मिल पाए हैं। दस्तावेज़ों की कमी के कारण कई ग्रामीण सरकारी योजनाओं का लाभ भी नहीं ले पा रहे हैं, जिससे फेंसिंग का काम भी धीमा पड़ा रहा।
स्थानीय लोगों का कहना है कि खुली सीमा लंबे समय से अवैध गतिविधियों का रास्ता बनी हुई है। ऐसे में वे चाहते हैं कि फेंसिंग का काम जल्द पूरा हो, ताकि क्षेत्र में सुरक्षा और शांति बहाल हो सके।