खुशी में भी क्यों आ जाते हैं आंसू? जानिए इसके पीछे का मनोवैज्ञानिक कारण

Saroj kanwar
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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। जिंदगी में कुछ पल ऐसे होते हैं, जो हमें अंदर तक छू जाते हैं। कभी अचानक किसी पुराने दोस्त से मुलाकात हो जाए, कभी लंबे संघर्ष के बाद सफलता मिल जाए या फिर अपने बच्चों को आगे बढ़ते देख दिल गर्व से भर जाए—ऐसे खास मौकों पर कई बार आंखें खुद-ब-खुद नम हो जाती हैं।

अक्सर लोगों का मानना होता है कि आंसू सिर्फ दुख या दर्द की निशानी हैं, लेकिन वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक इससे अलग राय रखते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, खुशी में रो पड़ना इंसानी भावनाओं की एक सामान्य और प्राकृतिक प्रतिक्रिया है। जब भावनाएं जरूरत से ज्यादा बढ़ जाती हैं, तो शरीर उन्हें संतुलित करने के लिए आंसुओं का सहारा लेता है।

दिमाग और भावनाओं का गहरा रिश्ता

मनोविज्ञान के मुताबिक, हमारा दिमाग सिर्फ दुख ही नहीं बल्कि अत्यधिक खुशी, राहत, गर्व और भावनात्मक जुड़ाव को भी गहराई से महसूस करता है। यही वजह है कि शादी, बड़ी उपलब्धि या लंबे समय बाद अपनों से मिलने जैसे पलों में आंखें भर आती हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसी स्थिति में मस्तिष्क का “लिम्बिक सिस्टम” सक्रिय हो जाता है, जो भावनाओं को नियंत्रित करने का काम करता है। जब इंसान बेहद खुश या भावुक होता है, तो नर्वस सिस्टम तेजी से प्रतिक्रिया देता है और आंसुओं के रूप में भावनाएं बाहर निकलती हैं। यह शरीर का खुद को भावनात्मक रूप से संतुलित करने का तरीका माना जाता है।

इमोशनल टियर्स क्यों होते हैं खास?

वैज्ञानिकों ने आंसुओं को मुख्य रूप से तीन भागों में बांटा है—बेसल टियर्स, रिफ्लेक्स टियर्स और इमोशनल टियर्स। खुशी या गहरे जज्बातों के समय जो आंसू निकलते हैं, उन्हें इमोशनल टियर्स कहा जाता है।

रिसर्च बताती है कि इन आंसुओं के जरिए शरीर तनाव बढ़ाने वाले कुछ हार्मोन और रसायनों को बाहर निकालता है। यही कारण है कि रो लेने के बाद इंसान मानसिक रूप से हल्का और सुकून महसूस करता है।

शरीर का अनोखा डिफेंस सिस्टम

विज्ञान में इस प्रतिक्रिया को “डाइमॉर्फस एक्सप्रेशन” कहा जाता है। इसका मतलब है कि शरीर कभी-कभी भावनाओं को संभालने के लिए उलटी प्रतिक्रिया देता है। जैसे बहुत ज्यादा खुशी में रोना या तनाव में अचानक हंस पड़ना।

विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसा इसलिए होता है ताकि शरीर तीव्र भावनाओं को नियंत्रित कर सके और व्यक्ति मानसिक संतुलन बनाए रखे।

खुशी के आंसू कमजोरी नहीं हैं

कई लोग रोने को कमजोरी मान लेते हैं, खासकर पुरुषों के मामले में समाज अक्सर भावनाएं छिपाने का दबाव बनाता है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि भावुक होकर रोना इस बात का संकेत है कि व्यक्ति अपनी भावनाओं को गहराई से महसूस करता है।

रिसर्च यह भी बताती है कि महिलाओं की तुलना में पुरुष कम इमोशनल टियर्स बहाते हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वे कम भावुक होते हैं। फर्क सिर्फ भावनाएं जाहिर करने के तरीके में होता है।

‘फील गुड’ हार्मोन देते हैं राहत

जब इंसान खुशी या भावुकता से भर जाता है, तो शरीर में ऑक्सीटोसिन और एंडॉर्फिन जैसे हार्मोन रिलीज होते हैं। इन्हें “फील गुड” हार्मोन कहा जाता है क्योंकि ये तनाव कम करने और मानसिक शांति देने में मदद करते हैं।

इसी वजह से दिल खोलकर रो लेने के बाद अधिकतर लोग खुद को पहले से ज्यादा शांत और बेहतर महसूस करते हैं।

कब जरूरी हो जाती है विशेषज्ञ की सलाह?

खुशी में आंसू आना पूरी तरह सामान्य माना जाता है, लेकिन अगर कोई व्यक्ति बिना वजह लगातार रो रहा हो, मूड बार-बार बदल रहा हो या मानसिक तनाव लंबे समय तक बना रहे, तो मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह लेना जरूरी हो सकता है।

रिश्तों को भी मजबूत बनाते हैं आंसू

विशेषज्ञों के अनुसार, भावुक होकर रोना सिर्फ हमारी भावनाओं को बाहर नहीं लाता, बल्कि रिश्तों में भी गहराई बढ़ाता है। जब कोई व्यक्ति खुशी या भावुकता में आंसू बहाता है, तो सामने वाला उससे ज्यादा जुड़ाव और सहानुभूति महसूस करता है।

इसलिए अगली बार अगर किसी खुशी के मौके पर आपकी आंखें नम हो जाएं, तो उसे कमजोरी न समझें। यह इंसानी भावनाओं की खूबसूरती है और इस बात का संकेत भी कि दिल और दिमाग के बीच गहरा तालमेल मौजूद है।

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