नई दिल्ली। इलेक्ट्रिक कार, स्मार्टफोन, विंड टर्बाइन और आधुनिक डिफेंस सिस्टम जैसे क्षेत्रों की बढ़ती जरूरतों के साथ रेयर अर्थ एलिमेंट्स और क्रिटिकल मिनरल्स की अहमियत भी तेजी से बढ़ रही है। इन खनिजों और उनसे तैयार होने वाले उत्पादों के बिना कई हाईटेक चीजों का बड़े पैमाने पर निर्माण मुश्किल है। भारत के सामने बड़ी चुनौती यह है कि कुछ महत्वपूर्ण उत्पादों के लिए अभी भी उसे विदेशों से आयात पर निर्भर रहना पड़ता है। खासतौर पर हाई-परफॉर्मेंस रेयर अर्थ परमानेंट मैग्नेट की घरेलू जरूरत फिलहाल लगभग पूरी तरह आयात से पूरी होती है। इसी निर्भरता को कम करने के लिए सरकार देश में मैन्युफैक्चरिंग क्षमता बढ़ाने पर जोर दे रही है।
इलेक्ट्रिक कार से विंड टर्बाइन तक, हर जगह मैग्नेट की जरूरत
रेयर अर्थ परमानेंट मैग्नेट बेहद शक्तिशाली मैग्नेट होते हैं, जिनका इस्तेमाल इलेक्ट्रिक व्हीकल की मोटर, विंड टर्बाइन, इलेक्ट्रॉनिक्स, एयरोस्पेस और डिफेंस जैसे कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में किया जाता है। इलेक्ट्रिक कारों की मोटर में इनकी भूमिका बेहद अहम है। वहीं, विंड टर्बाइन में भी इनका इस्तेमाल किया जाता है।
जैसे-जैसे इलेक्ट्रिक वाहनों और रिन्यूएबल एनर्जी का विस्तार होगा, वैसे-वैसे इन मैग्नेट की मांग बढ़ने की संभावना है। सरकारी अनुमान के अनुसार, भारत में रेयर अर्थ परमानेंट मैग्नेट की सालाना मांग वर्ष 2030 तक करीब 8,220 मीट्रिक टन पहुंच सकती है। इसमें इलेक्ट्रिक व्हीकल और विंड टर्बाइन सेक्टर की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा रहने की उम्मीद है।
7,280 करोड़ रुपये की योजना से बढ़ेगी घरेलू मैन्युफैक्चरिंग
भारत सरकार ने नवंबर 2025 में रेयर अर्थ परमानेंट मैग्नेट की घरेलू उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिए 7,280 करोड़ रुपये की योजना को मंजूरी दी थी। इसके तहत देश में हर साल 6,000 मीट्रिक टन की इंटीग्रेटेड मैन्युफैक्चरिंग क्षमता विकसित करने का लक्ष्य रखा गया है।
इस योजना का उद्देश्य केवल तैयार मैग्नेट बनाना नहीं है। सरकार पूरी सप्लाई चेन को भारत में विकसित करना चाहती है। प्रक्रिया रेयर अर्थ ऑक्साइड से शुरू होकर मेटल और एलॉय के निर्माण तक जाएगी और इसके बाद तैयार मैग्नेट तैयार किए जाएंगे। इससे भारत को विदेशों से तैयार मैग्नेट खरीदने की जरूरत कम करने में मदद मिल सकती है।
5 कंपनियों को मिल सकता है उत्पादन का मौका
इस योजना के तहत ग्लोबल बिडिंग के माध्यम से पांच कंपनियों का चयन किया जाना है। सरकार के अनुसार, अब तक 20 बोलियां प्राप्त हो चुकी हैं। इनमें से पांच कंपनियों को चुना जाएगा। प्रत्येक कंपनी को सालाना 600 से 1,200 मीट्रिक टन तक उत्पादन क्षमता आवंटित की जा सकती है।
योजना में 750 करोड़ रुपये की कैपिटल सब्सिडी और 6,450 करोड़ रुपये का सेल्स-लिंक्ड इंसेंटिव शामिल है। इसके लिए मार्च 2026 में ग्लोबल टेंडर जारी किया गया था। बाद में बोली जमा करने की अंतिम तारीख बढ़ाकर 29 जुलाई 2026 कर दी गई, जबकि तकनीकी बोलियां 30 जुलाई को खोली जानी थीं।
चार राज्यों में बनेंगे क्रिटिकल मिनरल प्रोसेसिंग पार्क
रेयर अर्थ मैग्नेट के अलावा सरकार क्रिटिकल मिनरल्स की प्रोसेसिंग क्षमता बढ़ाने पर भी काम कर रही है। इसके लिए आंध्र प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र और ओडिशा में विशेष क्रिटिकल मिनरल प्रोसेसिंग पार्क विकसित करने की तैयारी है।
नेशनल क्रिटिकल मिनरल मिशन के तहत इन पार्कों के लिए 500 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। इन चारों राज्यों में पार्कों के लिए स्थान भी निर्धारित किए जा चुके हैं।
इन पार्कों का उद्देश्य देश में उपलब्ध या विदेशों से आयात किए जाने वाले महत्वपूर्ण खनिजों की केवल सप्लाई तक सीमित नहीं रहना है। सरकार चाहती है कि इन खनिजों की प्रोसेसिंग भारत में हो और उनसे जुड़ी डाउनस्ट्रीम इंडस्ट्री भी देश के भीतर विकसित हो।
कौन-कौन से क्रिटिकल मिनरल्स हैं महत्वपूर्ण?
क्रिटिकल मिनरल्स आधुनिक उद्योगों के लिए बेहद जरूरी संसाधन हैं। इनका इस्तेमाल बैटरी, इलेक्ट्रॉनिक्स, डिफेंस, सेमीकंडक्टर और क्लीन एनर्जी जैसे क्षेत्रों में होता है। लिथियम और कोबाल्ट इलेक्ट्रिक वाहनों की बैटरी के लिए महत्वपूर्ण खनिज हैं।
हालांकि, प्रस्तावित मिनरल पार्कों का फोकस केवल लिथियम और कोबाल्ट तक सीमित नहीं रहेगा। अलग-अलग महत्वपूर्ण खनिजों की प्रोसेसिंग के साथ उनसे संबंधित उद्योगों को बढ़ावा देना भी इसका उद्देश्य है। ओडिशा में प्रस्तावित पार्क में रिसाइक्लिंग को भी प्रमुख गतिविधियों में शामिल किया जा रहा है।
चीन पर निर्भरता घटाना क्यों जरूरी?
रेयर अर्थ और क्रिटिकल मिनरल्स की वैश्विक सप्लाई चेन में चीन की महत्वपूर्ण भूमिका है। भारत के पास रेयर अर्थ संसाधन मौजूद होने के बावजूद उन्हें हाईटेक उत्पादों में बदलने की पूरी क्षमता अभी विकसित नहीं हुई है।
सरकार के अनुसार, भारत में रेयर अर्थ की माइनिंग, सेपरेशन और ऑक्साइड रिफाइनिंग की क्षमता मौजूद है। चुनौती ऑक्साइड को मेटल, मेटल को एलॉय और फिर एलॉय को तैयार मैग्नेट में बदलने के लिए बड़े पैमाने की मैन्युफैक्चरिंग क्षमता विकसित करने की है।
यही वजह है कि भारत वर्तमान में अपनी सिंटर्ड नियोडिमियम-आयरन-बोरॉन (NdFeB) मैग्नेट की जरूरत के लिए आयात पर निर्भर है। सरकार अब इसी उत्पादन श्रृंखला की कमजोर कड़ियों को मजबूत करने की कोशिश कर रही है।
आम लोगों को क्या फायदा मिलेगा?
इस योजना का असर तुरंत आम बाजार में दिखाई देना जरूरी नहीं है, लेकिन लंबी अवधि में इसके कई फायदे हो सकते हैं। सबसे बड़ा लाभ इलेक्ट्रिक व्हीकल इंडस्ट्री को मिलने की उम्मीद है। यदि मोटरों में इस्तेमाल होने वाले जरूरी मैग्नेट देश में बनने लगते हैं, तो कंपनियों की आयात पर निर्भरता घट सकती है।
घरेलू उत्पादन बढ़ने से वैश्विक सप्लाई में आने वाली रुकावटों का असर भी कम किया जा सकता है। इसके अलावा इलेक्ट्रॉनिक्स और ग्रीन एनर्जी सेक्टर को भी मजबूत घरेलू सप्लाई चेन का फायदा मिल सकता है। मोबाइल, कंप्यूटर, विंड टर्बाइन और कई अन्य हाईटेक उपकरणों में रेयर अर्थ आधारित सामग्री का इस्तेमाल होता है।
डिफेंस सेक्टर के लिए भी रणनीतिक कदम
रेयर अर्थ परमानेंट मैग्नेट का महत्व केवल इलेक्ट्रिक कार और इलेक्ट्रॉनिक्स तक सीमित नहीं है। एयरोस्पेस और डिफेंस सिस्टम में भी इनका इस्तेमाल होता है। इसलिए इनकी घरेलू मैन्युफैक्चरिंग क्षमता बढ़ाना भारत की रणनीतिक जरूरतों के लिहाज से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
भविष्य में यदि किसी वैश्विक संकट, व्यापारिक तनाव या सप्लाई चेन में बाधा के कारण इन महत्वपूर्ण सामग्रियों का आयात प्रभावित होता है, तो घरेलू उत्पादन देश के लिए एक मजबूत बैकअप साबित हो सकता है। इसी वजह से रेयर अर्थ मैग्नेट और क्रिटिकल मिनरल्स के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता बढ़ाने की सरकार की कोशिश को केवल औद्योगिक पहल नहीं, बल्कि आर्थिक और रणनीतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।