केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री Nitin Gadkari ने नागपुर में एक कार्यक्रम के दौरान एथेनॉल आधारित चूल्हे की नई तकनीक लॉन्च की। उन्होंने बताया कि यह चूल्हा पारंपरिक एलपीजी गैस की तुलना में कम खर्चीला होने के साथ-साथ पर्यावरण के लिए भी बेहतर साबित हो सकता है।
पानी और एथेनॉल के मिश्रण से चलता है यह चूल्हा
यह नई तकनीक पूरी तरह स्वदेशी है और खास बात यह है कि इसमें ईंधन के रूप में एथेनॉल और पानी का मिश्रण इस्तेमाल किया जाता है। जानकारी के अनुसार, यह चूल्हा 7 प्रतिशत एथेनॉल मिश्रित ईंधन पर काम करता है, जिससे लगातार और स्थिर लौ उत्पन्न होती है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह तकनीक एलपीजी और केरोसिन स्टोव की तुलना में अधिक सुरक्षित मानी जा रही है।
कैसे काम करता है एथेनॉल आधारित स्टोव?
इस स्टोव में एक विशेष ईंधन टैंक या बर्नर लगाया जाता है, जिसमें एथेनॉल मिश्रण भरा जाता है। स्टोव जलाने के बाद यह नियंत्रित और स्थिर लौ पैदा करता है, जिससे सामान्य तरीके से खाना पकाया जा सकता है। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें धुआं और प्रदूषण बेहद कम होता है।
भारत में तेजी से बढ़ रहा एथेनॉल उपयोग
पिछले कुछ वर्षों में भारत ने एथेनॉल ब्लेंडिंग प्रोग्राम में तेज प्रगति की है। वर्ष 2014 में पेट्रोल में एथेनॉल मिश्रण का स्तर करीब 1.5 प्रतिशत था, जो अब लगातार बढ़ रहा है। सरकार जैव ईंधन को बढ़ावा देने के लिए बड़े स्तर पर निवेश और नई नीतियों पर काम कर रही है। माना जा रहा है कि आने वाले समय में एथेनॉल का उपयोग केवल वाहनों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि घरेलू रसोई में भी इसकी भूमिका बढ़ सकती है।
एथेनॉल आधारित चूल्हे के प्रमुख फायदे
- एथेनॉल गन्ने और मक्का जैसी फसलों से तैयार होने वाला जैव ईंधन है।
- यह चूल्हा पारंपरिक बायोमास और केरोसिन स्टोव की तुलना में कम प्रदूषण फैलाता है।
- एलपीजी आयात पर निर्भरता घटाने में मदद मिल सकती है।
- गन्ना और मक्का उगाने वाले किसानों को अतिरिक्त लाभ मिलने की संभावना है।
- घरेलू खाना पकाने का खर्च कम हो सकता है।
- पर्यावरण को कम नुकसान पहुंचाने वाली तकनीक मानी जा रही है।
बड़े स्तर पर अपनाने में चुनौतियां भी मौजूद
विशेषज्ञों का मानना है कि एथेनॉल आधारित चूल्हों को देशभर में बड़े पैमाने पर लागू करने के लिए कई चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। इसके लिए ईंधन सप्लाई, वितरण व्यवस्था, सुरक्षा मानकों और उपभोक्ताओं में जागरूकता बढ़ाने जैसे कदम जरूरी होंगे। फिर भी, यह तकनीक भविष्य में एलपीजी का मजबूत विकल्प बन सकती है।