MP में हिंदी से छात्रों का हुआ मोहभंग, 9वीं में सबसे ज्यादा 1.58 लाख छात्रों ने छोड़ दिया है संस्कृत विषय

Saroj kanwar
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MP News: मध्य प्रदेश राज्य में हिंदी भाषा से लगातार छात्रों का मोहभंग होता जा रहा है। प्रदेश में स्कूल शिक्षा के क्षेत्र में बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। कक्षा 9वीं और 11वीं में छात्रों की प्राथमिकताओं में तेजी से बदलाव हो रहा है। परंपरागत रूप से पढ़ाई जा रही संस्कृत, हिंदी और अंग्रेजी जैसी भाषाएं अब छात्रों की पहली पसंद नहीं रहीं। उनकी जगह अब वोकेशनल विषय ले रहे हैं। जिनमें स्किल, रोजगार और तकनीकी समझ को प्राथमिकता दी जाती है। 

प्रदेश के स्कूलों के ताजा नामांकन आंकड़ों के मुताबिक कक्षा 9वीं में 1.89 लाख छात्रों ने वोकेशनल विषय लिया। इनमें से 1.58 लाख छात्रों ने संस्कृत और 7,600 छात्रों ने हिंदी छोड़कर स्किल आधारित विषयों को प्राथमिकता दी है। इसी तरह 11वीं कक्षा में भी बदलाव साफ दिखता है। जहां 19,125 ने हिंदी छोड़कर स्किल आधारित विषयों को अपनाया। शिक्षाविदों के अनुसार यह ट्रेंड संकेत देता है कि नई पीढ़ी अब स्कूली शिक्षा को करियर और रोजगार से जोड़कर देख रही है। संस्कृत और हिंदी जैसी भाषाएं जिन्हें संस्कृति और परंपरा का आधार माना जाता रहा है, अब ‘गैर-प्रासंगिक’ मानी जा रही हैं।

93 हजार ने की इंग्लिश से तौबा

ऐसा नहीं है कि आज के दौर में अंग्रेजी ही सबकुछ मायने रखती है। प्रदेश के 93 हजार छात्रों ने इंग्लिश विषय से तौबा कर ली है। 9वीं कक्षा में आते ही 23,206 बच्चों ने अंग्रेजी की जगह वोकेशनल विषय चुना। इसी तरह 11वीं कक्षा में भी 70,150 छात्रों ने अंग्रेजी की जगह वोकेशनल और स्किल आधारित विषयों को अपनाया है।

संस्कृत के सामने ज्यादा चुनौती

हाईस्कूल (10वीं) के लिए वर्ष 2025 की परीक्षा में भाषा विषयों के नामांकन भी यही संकेत देते हैं। हिंदी और अंग्रेजी के लगभग बराबर छात्र (8.06 लाख और 8.04 लाख) शामिल हुए, लेकिन संस्कृत के लिए यह संख्या सिर्फ 7.24 लाख रही। उर्दू, पंजाबी और गुजराती भाषाएं तो नाम मात्र पर ही मौजूद हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह ट्रेंड जारी रहा, तो भविष्य में संस्कृत जैसे विषयों को स्कूली पाठ्यक्रम में बनाए रखना मुश्किल हो सकता है।

कक्षा बढ़ने के साथ भाषा पर पकड़ कमजोर

परख राष्ट्रीय मूल्यांकन सर्वेक्षण के अनुसार भाषा विषय में मध्यप्रदेश के छात्रों का प्रदर्शन प्राथमिक स्तर पर तो राष्ट्रीय औसत से बेहतर रहा, लेकिन जैसे-जैसे कक्षा बढ़ी, उनकी भाषा पर पकड़ कमजोर होती चली गई। कक्षा तीसरी के छात्रों ने राष्ट्रीय औसत से 5 फीसदी ज्यादा स्कोर किया। छठवीं में भी यह बढ़त बनी रही। लेकिन कक्षा नवमी में यह ट्रेंड पलट गया। यहां छात्र-छात्राएं दोनों ही राष्ट्रीय औसत से पीछे रह गए। खासकर लड़कियों का स्कोर 7 फीसदी तक कम रहा।

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