Cheque Bounce:चेक बाउंस मामले में Supreme Court का बड़ा फैसला, हाई कोर्ट का फैसला हुआ निरस्त

Saroj kanwar
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Cheque Bounce: आज के आधुनिक युग में जब अधिकांश लेनदेन डिजिटल माध्यमों जैसे यूपीआई, नेट बैंकिंग और डेबिट कार्ड से हो रहे हैं फिर भी बड़ी राशि के भुगतान के लिए चेक एक महत्वपूर्ण और विश्वसनीय साधन बना हुआ है। व्यापारिक लेनदेन, संपत्ति की खरीद-बिक्री, ठेकेदारी के काम और बड़े कर्ज के भुगतान में चेक का उपयोग आम बात है। चेक एक कानूनी दस्तावेज है जो भुगतान का लिखित प्रमाण होता है। जब कोई व्यक्ति चेक देता है तो वह अपने बैंक को निर्देश देता है कि वह चेक में लिखी गई राशि चेक धारक को दे दे। लेकिन कई बार खाते में पर्याप्त राशि न होने या अन्य कारणों से चेक बाउंस हो जाता है जो एक गंभीर कानूनी समस्या बन जाता है।

चेक बाउंस होना है कानूनी अपराध

भारत में चेक का बाउंस होना केवल एक वित्तीय समस्या नहीं बल्कि एक कानूनी अपराध है। निगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट की धारा 138 के तहत चेक बाउंस होना अपराध की श्रेणी में आता है। यदि किसी व्यक्ति का चेक खाते में अपर्याप्त राशि के कारण या किसी अन्य कारण से बाउंस हो जाता है तो उसके खिलाफ आपराधिक मुकदमा चलाया जा सकता है। दोषी पाए जाने पर व्यक्ति को दो साल तक की कैद की सजा हो सकती है या चेक की राशि से दोगुनी तक जुर्माना हो सकता है या दोनों सजाएं एक साथ भी हो सकती हैं। यह कानून इसलिए बनाया गया था ताकि चेक लेनदेन की विश्वसनीयता बनी रहे और लोग चेक को हल्के में न लें। हालांकि यह एक नियामक अपराध है यानी इसका उद्देश्य सार्वजनिक हित में नियमों की पालना सुनिश्चित करना है।

सुप्रीम कोर्ट का ताजा निर्णय

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने चेक बाउंस के एक महत्वपूर्ण मामले में फैसला सुनाया है जो न्यायिक इतिहास में एक मील का पत्थर साबित हो सकता है। जस्टिस सुधांशु धूलिया और जस्टिस अमानुल्लाह की पीठ ने पी कुमारसामी नाम के एक व्यक्ति की सजा को रद्द कर दिया। इस मामले में अदालत ने पाया कि मामला दर्ज होने के बाद दोनों पक्षों ने आपस में समझौता कर लिया था। शिकायतकर्ता को पांच लाख पच्चीस हजार रुपये का पूरा भुगतान कर दिया गया था। इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने माना कि जब दोनों पक्ष समझौता करने को तैयार हैं और पूरा भुगतान हो चुका है तो मामले को आगे बढ़ाने का कोई औचित्य नहीं है। यह ग्यारह जुलाई को दिया गया एक बहुत ही महत्वपूर्ण आदेश था।

लंबित मामलों पर चिंता

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी कहा कि देश की अदालतों में चेक बाउंस के मामले बहुत बड़ी संख्या में लंबित हैं और यह न्यायिक प्रणाली के लिए एक गंभीर चिंता का विषय है। छोटे-छोटे चेक बाउंस के मामलों में सालों तक मुकदमेबाजी चलती रहती है जिससे अदालतों पर बोझ बढ़ता है और वास्तविक न्याय में देरी होती है। कई बार ऐसा होता है कि दोनों पक्ष आपस में समझौता करना चाहते हैं लेकिन कानूनी प्रक्रिया के चक्कर में फंसे रहते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि यदि किसी मामले में दोनों पक्ष समझौता करने के लिए इच्छुक हैं तो अदालतों को ऐसे समझौतों को बढ़ावा देना चाहिए और मामलों का शीघ्र निपटारा करना चाहिए।

दंडात्मक से प्रतिपूरक न्याय की ओर

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में एक और महत्वपूर्ण बात कही कि चेक बाउंस के मामलों में दंडात्मक पहलू यानी सजा देने की बजाय प्रतिपूरक पहलू यानी पीड़ित को उसका पैसा वापस दिलवाना अधिक महत्वपूर्ण है। कोर्ट का मानना है कि चेक बाउंस कानून का मुख्य उद्देश्य व्यापारिक लेनदेन में विश्वास बनाए रखना है न कि लोगों को जेल भेजना। यदि कोई व्यक्ति अपनी गलती मानता है और पूरा भुगतान कर देता है तो उसे जेल भेजने से क्या फायदा। इसके बजाय यदि समझौते से मामला सुलझ जाए तो यह सभी के लिए बेहतर है। पीड़ित को उसका पैसा मिल जाता है और अदालतों का बोझ भी कम होता है। यह एक व्यावहारिक और संतुलित दृष्टिकोण है।

पी कुमारसामी मामले की पूरी कहानी

इस मामले की शुरुआत वर्ष 2006 में हुई थी जब पी कुमारसामी उर्फ गणेश ने सुब्रमण्यम नाम के एक व्यक्ति से पांच लाख पच्चीस हजार रुपये उधार लिए थे। कर्ज चुकाने के लिए कुमारसामी ने अपनी साझेदारी फर्म मेसर्स न्यू वन एक्सपोर्ट के नाम से एक चेक जारी किया। लेकिन जब वह चेक बैंक में जमा किया गया तो खाते में अपर्याप्त राशि होने के कारण वह बाउंस हो गया। इसके बाद सुब्रमण्यम ने कुमारसामी के खिलाफ चेक बाउंस का मामला दर्ज करवाया। निचली अदालत ने कुमारसामी को दोषी पाया और एक साल की कैद की सजा सुनाई। कुमारसामी ने इस फैसले को अपीलीय अदालत में चुनौती दी। अपीलीय अदालत ने निचली अदालत के फैसले को पलट दिया और कुमारसामी को बरी कर दिया।

हाई कोर्ट का फैसला और सुप्रीम कोर्ट की अपील

लेकिन सुब्रमण्यम को यह फैसला मंजूर नहीं था इसलिए उसने हाई कोर्ट में अपील की। हाई कोर्ट ने अपीलीय अदालत के फैसले को रद्द कर दिया और निचली अदालत के मूल फैसले को बहाल कर दिया यानी कुमारसामी को फिर से दोषी ठहरा दिया गया। इसके बाद कुमारसामी और उनकी फर्म ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की। उन्होंने अदालत को बताया कि मामला दर्ज होने के बाद उन्होंने शिकायतकर्ता से समझौता कर लिया था और पूरी राशि का भुगतान कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने इन परिस्थितियों को देखते हुए और दोनों पक्षों के बीच हुए समझौते को ध्यान में रखते हुए हाई कोर्ट के फैसले को खारिज कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने अप्रैल 2019 के हाई कोर्ट के आदेश और अक्टूबर 2012 के निचली अदालत के आदेश दोनों को रद्द कर दिया।

समझौते को प्राथमिकता का संदेश

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने एक महत्वपूर्ण संदेश दिया है कि यदि दोनों पक्ष आपस में सुलह कर लेते हैं और पूरा भुगतान हो जाता है तो अदालतों को ऐसे समझौतों का सम्मान करना चाहिए। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि चेक बाउंस केवल एक नियामक अपराध है जिसे सार्वजनिक हित में अपराध की श्रेणी में रखा गया है ताकि वित्तीय लेनदेन में अनुशासन बना रहे। लेकिन जब मूल उद्देश्य यानी भुगतान पूरा हो जाता है तो केवल सजा देने के लिए मुकदमा चलाते रहना उचित नहीं है। यह फैसला भविष्य के चेक बाउंस मामलों में एक मिसाल बन सकता है।

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला न्यायिक प्रणाली में एक सकारात्मक बदलाव का संकेत है। यह दर्शाता है कि अदालतें दंड देने के बजाय समस्या के समाधान को प्राथमिकता दे रही हैं। हालांकि चेक लेनदेन में सावधानी बरतना और जिम्मेदारी से चेक जारी करना अभी भी बहुत जरूरी है। समझौते को बढ़ावा देने से न केवल अदालतों का बोझ कम होगा बल्कि न्याय भी शीघ्र मिलेगा।

Disclaimer

यह लेख केवल सामान्य जानकारी और जागरूकता के उद्देश्य से तैयार किया गया है। चेक बाउंस से संबंधित कानूनी प्रावधान जटिल हैं और विशिष्ट मामलों में अलग-अलग हो सकते हैं। यहां दी गई जानकारी किसी विशेष कानूनी मामले की सलाह नहीं है। यदि आप चेक बाउंस के किसी मामले में शामिल हैं तो कृपया किसी योग्य वकील से कानूनी परामर्श अवश्य लें। न्यायालय के फैसले मामले की विशेष परिस्थितियों पर निर्भर करते हैं। यह लेख किसी कानूनी सलाह का स्थान नहीं लेता।

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