सोने की कीमतों और जियो-पॉलिटिकल तनाव के बीच लंबे समय से एक मजबूत संबंध माना जाता रहा है। जब भी दुनिया में युद्ध या किसी बड़े संघर्ष का खतरा बढ़ता है, निवेशक अक्सर सोने को सुरक्षित निवेश विकल्प के तौर पर देखते हैं। हालांकि, 2026 की पहली छमाही के दौरान इस पारंपरिक ट्रेंड में बदलाव देखने को मिला है। अब केवल भू-राजनीतिक तनाव ही सोने की कीमतों को ऊपर बनाए रखने के लिए पर्याप्त नहीं दिख रहा है। महंगाई, ब्याज दरें और केंद्रीय बैंकों की मौद्रिक नीति जैसे आर्थिक संकेतक ज्यादा महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
मोतीलाल ओसवाल फाइनेंशियल सर्विसेज लिमिटेड (MOFSL) की ‘H1 2026 Precious Metals Report’ में बताया गया है कि निवेशकों का फोकस अब सिर्फ युद्ध या संघर्ष की खबरों तक सीमित नहीं है। बाजार यह भी आंक रहा है कि किसी जियो-पॉलिटिकल घटना का महंगाई, वास्तविक ब्याज दरों और भविष्य की मौद्रिक नीति पर क्या प्रभाव पड़ेगा।
युद्ध और सोने के बीच बदल रहा पुराना समीकरण
MOFSL में कमोडिटी रिसर्च के प्रमुख नवनीत दमानी के अनुसार, 2026 की पहली छमाही ने संकेत दिया है कि युद्ध और सोने की कीमतों के बीच संबंध पहले की तुलना में काफी हद तक परिस्थितियों पर निर्भर हो गया है।
उनका कहना है कि बाजार अब किसी संघर्ष को सिर्फ ‘सेफ हेवन’ यानी सुरक्षित निवेश की नजर से नहीं देखता। निवेशक यह समझने की कोशिश करते हैं कि उस घटना से महंगाई कितनी बढ़ सकती है, ब्याज दरों का क्या रुख रह सकता है और केंद्रीय बैंक अपनी नीतियों में किस तरह बदलाव कर सकते हैं।
बॉन्ड यील्ड बनी सोने के लिए बड़ी चुनौती
रिपोर्ट के मुताबिक, ऊंची बॉन्ड यील्ड सोने की कीमतों के लिए एक बड़ी बाधा बनकर सामने आई है। जब बॉन्ड और अन्य ब्याज देने वाले निवेश विकल्पों से बेहतर रिटर्न मिलने की उम्मीद बढ़ती है, तो बिना ब्याज देने वाली संपत्ति के तौर पर सोने की आकर्षकता कुछ कम हो सकती है।
खास बात यह है कि जियो-पॉलिटिकल तनाव ऊंचे स्तर पर रहने के बावजूद बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी ने सोने की तेजी को सीमित किया। इससे यह संकेत मिला कि बाजार के लिए अब सिर्फ वैश्विक तनाव नहीं, बल्कि ब्याज दरों और वास्तविक रिटर्न का गणित भी बेहद अहम हो गया है।
साल की शुरुआत में इन वजहों से मिला सोने को सपोर्ट
रिपोर्ट के अनुसार, 2026 की शुरुआत में कई कारकों ने सोने की कीमतों को मजबूती दी। इनमें नीतिगत अनिश्चितता, गोल्ड एक्सचेंज ट्रेडेड फंड्स (ETF) में निवेश, केंद्रीय बैंकों की खरीदारी और अमेरिकी फेडरल रिजर्व की ओर से ब्याज दरों में कटौती की उम्मीद प्रमुख थीं।
इन परिस्थितियों ने निवेशकों के बीच सोने की मांग को मजबूत किया और इसकी कीमतों को सपोर्ट मिला।
टैरिफ बढ़ने से बदला बाजार का रुख
बाद के दौर में बढ़े टैरिफ ने तस्वीर बदलने में अहम भूमिका निभाई। टैरिफ में बढ़ोतरी से कंपनियों की लागत बढ़ने और महंगाई पर दबाव बढ़ने की आशंका पैदा हुई। इसके चलते बाजार में यह उम्मीद मजबूत हुई कि ब्याज दरें लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बनी रह सकती हैं।
इसका असर अमेरिकी ट्रेजरी सिक्योरिटीज की वास्तविक यील्ड और डॉलर पर भी पड़ा। मजबूत डॉलर और बढ़ती वास्तविक यील्ड ने सोने की तेजी पर दबाव बनाया।
अमेरिका-ईरान संघर्ष से भी मिला बदलते ट्रेंड का संकेत
रिपोर्ट में अमेरिका-ईरान संघर्ष को भी सोने और जियो-पॉलिटिकल घटनाओं के बदलते संबंध का उदाहरण बताया गया है। संघर्ष बढ़ने की शुरुआत में निवेशकों ने सुरक्षा के लिए सोने का रुख किया, जिससे इसकी मांग में तेजी आई।
लेकिन इसके साथ कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी ने महंगाई को लेकर चिंता बढ़ा दी। इससे यह उम्मीद कमजोर हुई कि केंद्रीय बैंक जल्द मौद्रिक नीति में ढील देंगे। नतीजतन, सोने की तेजी सीमित हो गई और बाद में कीमतों में कुछ सुधार देखने को मिला।
टैरिफ अब महंगाई के लिए भी बड़ा जोखिम
रिपोर्ट में यह भी रेखांकित किया गया है कि टैरिफ को अब सिर्फ आर्थिक विकास के लिए खतरे के तौर पर नहीं देखा जा रहा। इनके कारण वस्तुओं और उत्पादन की लागत बढ़ सकती है, जिससे महंगाई पर अतिरिक्त दबाव पड़ने की आशंका रहती है।
यही वजह है कि टैरिफ से जुड़े फैसले अब सोने के बाजार के लिए भी महत्वपूर्ण हो गए हैं। यदि महंगाई बढ़ती है और ब्याज दरों में कटौती की उम्मीद पीछे जाती है, तो इसका असर सोने की कीमतों पर पड़ सकता है।
आगे किन फैक्टर्स पर रहेगी सोने-चांदी की नजर?
MOFSL की रिपोर्ट के अनुसार, आने वाले समय में कीमती धातुओं की दिशा तय करने में कई प्रमुख कारक महत्वपूर्ण रहेंगे। इनमें महंगाई का ट्रेंड, अमेरिकी फेडरल रिजर्व के नीतिगत संकेत, वैश्विक स्तर पर नकदी की उपलब्धता, केंद्रीय बैंकों की गोल्ड खरीदारी, गोल्ड ETF में निवेश और सट्टा गतिविधियां शामिल हैं।
इसका मतलब है कि भविष्य में सोने और चांदी की कीमतों को समझने के लिए केवल युद्ध या भू-राजनीतिक तनाव पर नजर रखना पर्याप्त नहीं होगा। निवेशकों को ब्याज दरों, डॉलर, महंगाई और केंद्रीय बैंकों की नीतियों जैसे आर्थिक संकेतकों पर भी बराबर ध्यान देना होगा।