अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान युद्ध के बीच एक ऐसा कूटनीतिक दांव चला है, जिसने पाकिस्तान को मुश्किल स्थिति में डाल दिया है। ट्रंप लगातार पाकिस्तान पर दबाव बना रहे हैं कि वह ‘अब्राहम अकॉर्ड’ में शामिल होकर इजरायल को आधिकारिक तौर पर एक संप्रभु राष्ट्र के रूप में मान्यता दे। इस मुद्दे ने पाकिस्तान के लिए नई राजनीतिक और कूटनीतिक चुनौती खड़ी कर दी है।
मुस्लिम देशों को साथ लाने की तैयारी में अमेरिका
डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ पर लंबी पोस्ट साझा करते हुए कहा कि मध्य पूर्व के सभी मुस्लिम देशों को अब्राहम अकॉर्ड का हिस्सा बनना चाहिए। ट्रंप के मुताबिक, इस समझौते से जुड़े देशों को आर्थिक और सामाजिक दोनों स्तर पर फायदा हुआ है और युद्ध जैसे हालात में भी किसी सदस्य देश ने इससे बाहर निकलने की इच्छा नहीं जताई।
ट्रंप ने यह भी कहा कि अमेरिका एक जटिल कूटनीतिक रणनीति पर काम कर रहा है, जिसके तहत प्रमुख मुस्लिम देशों और इजरायल के बीच रिश्तों को सामान्य बनाने की कोशिश की जा रही है। इसी रणनीति के कारण पाकिस्तान पर भी दबाव बढ़ गया है।
पाकिस्तान के सामने बढ़ी दुविधा
पाकिस्तान एक तरफ अमेरिका के साथ अपने संबंध मजबूत रखना चाहता है, वहीं दूसरी तरफ इजरायल को मान्यता देने का मुद्दा उसके लिए बेहद संवेदनशील बना हुआ है। अगर पाकिस्तान ट्रंप के दबाव में आकर अब्राहम अकॉर्ड में शामिल होता है, तो उसे घरेलू स्तर पर भारी विरोध का सामना करना पड़ सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला पाकिस्तान की राजनीति और समाज दोनों में बड़ा विवाद पैदा कर सकता है, क्योंकि देश में लंबे समय से इजरायल विरोधी सोच मजबूत रही है।
इजरायल को मान्यता देने पर बदलना पड़ेगा कानून
पाकिस्तान ने अपने 78 साल के इतिहास में कभी भी इजरायल को आधिकारिक मान्यता नहीं दी है। यही वजह है कि पाकिस्तानी पासपोर्ट पर साफ लिखा होता है कि यह पासपोर्ट इजरायल को छोड़कर दुनिया के सभी देशों में मान्य है।
अगर पाकिस्तान अब्राहम अकॉर्ड पर हस्ताक्षर करता है, तो उसे अपने पासपोर्ट नियमों में बदलाव करना पड़ेगा। इसके साथ ही वीजा सिस्टम, दूतावास व्यवस्था और इमिग्रेशन कानूनों में भी बड़े बदलाव करने होंगे। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम पाकिस्तान सरकार के लिए घरेलू राजनीति में भारी नुकसान का कारण बन सकता है।
पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ने जताई नाराजगी
ट्रंप के इस दबाव पर पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि पाकिस्तान किसी ऐसे समझौते का हिस्सा नहीं बन सकता, जो उसकी बुनियादी विचारधारा के खिलाफ हो।
उन्होंने कहा, “हम उन लोगों के साथ कैसे बैठ सकते हैं, जिनकी बात पर भरोसा करना मुश्किल हो?” ख्वाजा आसिफ के इस बयान से साफ संकेत मिलता है कि पाकिस्तान फिलहाल ट्रंप के दबाव के आगे झुकने के मूड में नहीं है।
आर्थिक संकट के बीच बढ़ी मुश्किलें
पाकिस्तान पहले से ही गंभीर आर्थिक संकट का सामना कर रहा है। देश की अर्थव्यवस्था काफी हद तक अमेरिकी मदद और आईएमएफ के समर्थन पर निर्भर है। ऐसे समय में इजरायल को मान्यता देने का मुद्दा पाकिस्तान के लिए नई परेशानी बन गया है।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि पाकिस्तान अमेरिका के दबाव, घरेलू राजनीति और अपनी पारंपरिक विदेश नीति के बीच संतुलन कैसे बनाएगा। आने वाले समय में यह मुद्दा पाकिस्तान की राजनीति और अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर बड़ा असर डाल सकता है।