बीमा दावा विवाद: नाम में मामूली अंतर बना बड़ी परेशानी, उपभोक्ता आयोग ने दिया अहम फैसला
शादी के बाद महिलाओं द्वारा अपने पति का उपनाम अपनाना भारत में एक सामान्य सामाजिक परंपरा है। लेकिन दिल्ली की एक महिला के मामले में यही परंपरा उसके लिए गंभीर कानूनी और आर्थिक परेशानी का कारण बन गई। नाम में छोटे से बदलाव के चलते बीमा कंपनी ने उसकी मैच्योर जीवन बीमा पॉलिसी का भुगतान रोक दिया, जिसके बाद मामला उपभोक्ता आयोग तक पहुंच गया और लंबी कानूनी लड़ाई के बाद महिला को न्याय मिला।
बीमा कंपनी पर सेवा में कमी का आरोप
पूर्वोत्तर जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने बीमा कंपनी को सेवा में कमी का दोषी ठहराया और स्पष्ट कहा कि किसी उपभोक्ता के वैध दावे को केवल तकनीकी आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता। आयोग की पीठ, जिसमें अध्यक्ष सुरिंदर कुमार शर्मा और सदस्य आदर्श नैन शामिल थे, ने पीड़िता के पक्ष में फैसला सुनाते हुए बीमा राशि ब्याज सहित लौटाने का आदेश दिया।
2012 में ली गई थी पॉलिसी
यह मामला दिल्ली के यमुना विहार निवासी प्रीति विंडलेश से जुड़ा है। उन्होंने 24 दिसंबर 2012 को आईएनजी लाइफ इंश्योरेंस से एक जीवन बीमा पॉलिसी खरीदी थी। समय के साथ आईएनजी लाइफ का विलय पहले एक्साइड लाइफ और फिर एचडीएफसी लाइफ इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड में हो गया।
दिसंबर 2023 में पॉलिसी मैच्योर होने पर कंपनी ने ₹5,12,069 की राशि का चेक जारी किया। हालांकि, यह चेक उनके पुराने नाम “प्रीति” के नाम पर बनाया गया था, जबकि शादी के बाद उनके सभी आधिकारिक दस्तावेजों में उनका नाम “प्रीति विंडलेश” दर्ज हो चुका था।
नाम की गड़बड़ी बनी भुगतान में बाधा
जब महिला ने यह चेक कोटक महिंद्रा बैंक में जमा किया, तो नाम में असमानता के कारण इसे अस्वीकार कर दिया गया। इसके बाद उन्होंने बीमा कंपनी के खिलाफ उपभोक्ता आयोग में शिकायत दर्ज कराई।
सुनवाई के दौरान आयोग ने पाया कि नाम में मामूली तकनीकी त्रुटि के कारण वास्तविक दावे को रोका गया, जो उचित नहीं है।
आयोग का सख्त आदेश
आयोग ने बीमा कंपनी को निर्देश दिया कि वह शिकायत दर्ज होने की तारीख से भुगतान तक 9% वार्षिक ब्याज के साथ पूरी बीमा राशि का भुगतान करे।
इसके अलावा, मानसिक उत्पीड़न के लिए महिला को ₹45,000 और मुकदमेबाजी खर्च के रूप में ₹20,000 अलग से देने का भी आदेश दिया गया।
निष्कर्ष
यह फैसला स्पष्ट करता है कि उपभोक्ता अधिकारों के मामलों में केवल तकनीकी त्रुटियों के आधार पर वैध दावों को खारिज नहीं किया जा सकता। उपभोक्ता आयोग ने यह भी दोहराया कि वास्तविक हकदार को उसका अधिकार समय पर मिलना चाहिए, चाहे दस्तावेजों में मामूली अंतर ही क्यों न हो।