जंगल के इन बीजों से होती तगड़ी कमाई! विदेशों तक है डिमांड, दवा-बिस्किट से लेकर कॉस्मेटिक इंडस्ट्री में होता इस्तेमाल

Saroj kanwar
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झारखंड के घने जंगल केवल अपनी प्राकृतिक खूबसूरती के लिए ही नहीं, बल्कि यहां मिलने वाली वन संपदा के लिए भी मशहूर हैं. इन्हीं वन उत्पादों में साल के पेड़ का फल ग्रामीणों की आजीविका का बड़ा सहारा बन चुका है. गर्मियों के मौसम में जंगलों से मिलने वाला यह फल स्थानीय लोगों के लिए कमाई का अहम जरिया साबित होता है. देखने में साधारण लगने वाले इस फल के बीज की मांग देश के कई राज्यों के साथ-साथ विदेशों तक बनी रहती है.

सुबह 4 बजे शुरू हो जाती है मेहनत

साल के फल को इकट्ठा करना आसान काम नहीं है. गांव के लोग तड़के सुबह करीब 4 बजे ही जंगलों की ओर निकल पड़ते हैं. इस समय तक पेड़ों से पके फल जमीन पर गिर चुके होते हैं, जिससे उन्हें आसानी से इकट्ठा किया जा सकता है. तेज धूप होने से पहले पूरा परिवार मिलकर जंगल में बिखरे फलों को चुनता है और उन्हें एक जगह जमा करता है.

फल से बीज निकालने की खास प्रक्रिया

ग्रामीणों का कहना है कि फल इकट्ठा करने के बाद असली मेहनत शुरू होती है. सबसे पहले इन फलों को जलाकर उनका बाहरी हिस्सा हटाया जाता है. इसके बाद अंदर मौजूद गोल बीज को अलग किया जाता है. बीजों को अच्छी तरह साफ कर सुखाया जाता है और फिर बाजार में बेचने के लिए तैयार किया जाता है. स्थानीय मंडियों में साल के बीज की कीमत करीब 20 से 30 रुपये प्रति किलो तक मिल जाती है.

साल के बीज से बनता है तेल

साल के बीज का सबसे अधिक उपयोग तेल निकालने में किया जाता है. इस तेल का इस्तेमाल खाना पकाने, साबुन और कॉस्मेटिक उत्पाद बनाने में होता है. इसके अलावा आयुर्वेदिक और पारंपरिक दवाइयों में भी इसका उपयोग किया जाता है. कई उद्योगों में साल फैट का इस्तेमाल चॉकलेट, बिस्किट और अन्य खाद्य पदार्थ तैयार करने में भी किया जाता है.

विदेशों तक पहुंचती है मांग

विशेषज्ञों के मुताबिक साल के बीज में वसा की मात्रा अधिक होती है, जिसकी वजह से इसकी औद्योगिक मांग लगातार बढ़ रही है. झारखंड के जंगलों से जुटाए गए बीज देश के अलग-अलग राज्यों में भेजे जाते हैं. कुछ मामलों में इनका निर्यात विदेशों तक भी किया जाता है, जहां इनसे तेल और कई अन्य उत्पाद तैयार किए जाते हैं.

ग्रामीणों की अर्थव्यवस्था का अहम हिस्सा

आज भी झारखंड के कई गांवों में साल का फल केवल वन उपज नहीं, बल्कि रोजगार और परंपरा का हिस्सा माना जाता है. जंगलों से शुरू होने वाली यह मेहनत ग्रामीण परिवारों की आय बढ़ाने के साथ-साथ स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी मजबूत करने का काम करती है.

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