पीएम ई-ड्राइव: भारत की इलेक्ट्रिक वाहन नीति अब केवल शुरुआती प्रोत्साहनों तक सीमित नहीं है, बल्कि एक टिकाऊ और मजबूत ढांचे की ओर बढ़ती दिख रही है। काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर के ग्रीन फाइनेंस सेंटर द्वारा जारी एक स्वतंत्र अध्ययन इस बदलाव की स्पष्ट तस्वीर पेश करता है। रिपोर्ट के अनुसार, पीएम ई-ड्राइव योजना ने अपने पहले ही वर्ष में 11.3 लाख इलेक्ट्रिक वाहनों की बिक्री को बढ़ावा दिया, जो नीति की दिशा और बाजार की परिपक्वता दोनों को दर्शाता है।
कम सब्सिडी के बावजूद मजबूत मांग
इस उपलब्धि का सबसे उल्लेखनीय पहलू यह है कि पीएम ई-ड्राइव के तहत प्रति वाहन प्रोत्साहन राशि एफएएमई-II योजना की तुलना में लगभग आधी थी। इसके बावजूद, बिक्री में तीव्र वृद्धि यह दर्शाती है कि भारत का इलेक्ट्रिक वाहन बाजार सब्सिडी पर निर्भर प्रारंभिक चरण से आगे निकल चुका है। उपभोक्ता विश्वास, उन्नत तकनीक और कम परिचालन लागत अब इलेक्ट्रिक वाहनों को अपने आप में एक आकर्षक विकल्प बना रहे हैं।
एफएएमई-II से पीएम ई-ड्राइव तक का सफर
सीईईडब्ल्यू-जीएफसी रिपोर्ट में कहा गया है कि एफएएमई-II योजना ने देश में इलेक्ट्रिक मोबिलिटी की नींव रखी। इसके विपरीत, पीएम ई-ड्राइव ने उस नींव पर आगे बढ़ते हुए दक्षता और स्थिरता पर जोर दिया है। आंकड़ों के अनुसार, पीएम ई-ड्राइव के तहत वार्षिक इलेक्ट्रिक वाहन बिक्री एफएएमई-II की तुलना में लगभग 3.4 गुना अधिक रही है। यह बदलाव नीति की परिपक्वता और बाजार की मजबूती को दर्शाता है।
ऑटोमोटिव सेक्टर में विद्युतीकरण की गति
भारत का ऑटोमोटिव सेक्टर, जो जीडीपी में 7 प्रतिशत से अधिक का योगदान देता है और लाखों लोगों को रोजगार प्रदान करता है, तेजी से इलेक्ट्रिक भविष्य की ओर बढ़ रहा है। वित्त वर्ष 2014-15 में इलेक्ट्रिक वाहनों की बिक्री कुछ हजार इकाइयों तक सीमित थी, लेकिन 2024-25 में यह संख्या लगभग 19.6 लाख इकाइयों तक पहुंच गई। कुल वाहन बिक्री में इलेक्ट्रिक वाहनों की हिस्सेदारी अब लगभग 7.5 प्रतिशत तक पहुंच गई है, जो एक बड़े संरचनात्मक बदलाव का संकेत है। इलेक्ट्रिक वाहन सेगमेंट का बदलता परिदृश्य
रिपोर्ट के अनुसार, शुरुआती वर्षों में इलेक्ट्रिक थ्री-व्हीलर्स का बाजार पर दबदबा था, लेकिन अब यह स्थिति बदल रही है। वित्त वर्ष 2021-22 से इलेक्ट्रिक टू-व्हीलर्स में जबरदस्त वृद्धि देखी गई है। 2024-25 तक, यह सेगमेंट सबसे बड़ा इलेक्ट्रिक वाहन वर्ग बन गया है, जिसकी बिक्री 11.5 लाख इकाइयों से अधिक हो गई है। यह बदलाव दर्शाता है कि इलेक्ट्रिक वाहन अब केवल व्यावसायिक जरूरतों तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि आम उपभोक्ताओं के बीच भी तेजी से स्वीकार्यता प्राप्त कर रहे हैं।
नीति निर्माताओं के लिए नई चुनौतियां
CIIW के विशेषज्ञों का मानना है कि प्रोत्साहन राशि कम होने के बावजूद इतनी अधिक बिक्री यह साबित करती है कि बाजार के कई खंड आत्मनिर्भर हो गए हैं। हालांकि, राज्यों और विभिन्न वाहन श्रेणियों में इलेक्ट्रिक वाहनों को अपनाने की गति में असमानताएं बनी हुई हैं। इससे स्पष्ट होता है कि भविष्य की नीतियां केवल एक समान सब्सिडी पर आधारित नहीं हो सकतीं, बल्कि इसके लिए लक्षित रणनीतियों और मजबूत चार्जिंग बुनियादी ढांचे की आवश्यकता होगी।
राज्यों में इलेक्ट्रिक वाहनों को अपनाने में असमानताएं
राष्ट्रीय स्तर पर सकारात्मक स्थिति के बावजूद, इलेक्ट्रिक वाहनों को अपनाने में क्षेत्रीय असमानताएं स्पष्ट हैं। दिल्ली, गोवा और कर्नाटक जैसे राज्यों में इलेक्ट्रिक दोपहिया और चारपहिया वाहनों की हिस्सेदारी अपेक्षाकृत अधिक है। वहीं, बिहार और त्रिपुरा जैसे राज्यों में अभी भी इलेक्ट्रिक तीनपहिया वाहनों का दबदबा है। यहां तक कि पीएम ई-ड्राइव योजना के तहत भी, कुछ श्रेणियों ने निर्धारित लक्ष्यों से बेहतर प्रदर्शन किया, जबकि अन्य पीछे रह गईं।
आगे की राह और नीतिगत सिफ़ारिशें
CIIW-GFC का सुझाव है कि 2030 तक 30 प्रतिशत इलेक्ट्रिक वाहनों को अपनाने के लक्ष्य को राष्ट्रीय नीति में औपचारिक रूप से शामिल किया जाना चाहिए। इसके साथ ही, वाहन श्रेणियों के आधार पर उप-लक्ष्यों, राज्यों के बीच बेहतर समन्वय और डेटा पारदर्शिता पर ज़ोर दिया जाना चाहिए। रिपोर्ट यह भी सुझाव देती है कि संसाधन आवंटन लचीला और मांग के अनुरूप होना चाहिए, ताकि भारत में इलेक्ट्रिक वाहनों की ओर बदलाव न केवल तेज़ हो, बल्कि संतुलित और समावेशी भी हो।