Eco-Friendly गणेश से मनाएं चतुर्थी, हर मूर्ति में हो प्रकृति की चिंता

Saroj kanwar
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Damoh News: गणेश चतुर्थी भारत का एक प्रमुख पर्व है, जिसे सदियों से श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है। गणपति जी को ज्ञान, बुद्धि और समझ के प्रतीक माना जाता है। भारत में शिक्षा की शुरुआत हो या कोई नया कार्य, सबसे पहले गणेश जी का आह्वान किया जाता है।

इस त्योहार की खास बात यह है कि हम स्वयं भगवान की मूर्ति बनाते हैं, उन्हें सजाते हैं, उनकी पूजा करते हैं और फिर श्रद्धा से विसर्जित कर देते हैं। यह परंपरा केवल भारतीय संस्कृति में देखने को मिलती है, जहां मूर्ति को पूजने के बाद विसर्जित कर देना ईश्वर को भीतर उतारने का प्रतीक माना जाता है। लेकिन यह प्रक्रिया जिम्मेदारी से की जानी चाहिए।

आज के समय में गणेश जी की मूर्तियां प्लास्टर ऑफ पेरिस और रासायनिक रंगों से बनाई जाती हैं, जो पानी और पर्यावरण को नुकसान पहुंचाते हैं। इसीलिए जरूरी है कि हम मिट्टी, आटा, हल्दी या अन्य जैविक चीजों से मूर्तियां बनाएं, जो घर पर ही आसानी से विसर्जित की जा सकें। अगर रंग भरना हो तो वनस्पति आधारित रंगों का उपयोग करें, जो न केवल सुरक्षित हैं बल्कि मूर्ति को सुंदर भी बनाते हैं।

सद्गुरु जग्गी वासुदेव के अनुसार, गणेश जी केवल भक्ति नहीं, बुद्धिमत्ता के भी प्रतीक हैं। ऐसे में उनके नाम पर पर्यावरण को नुकसान पहुंचाना पूरी तरह गलत है। अगर हम इस परंपरा को बनाए रखना चाहते हैं, तो इसे प्रकृति के अनुकूल ढंग से निभाना होगा। इस बार आइए, हम सभी मिट्टी के गणेश बनाएं, घर में ही उनका विसर्जन करें और पर्व को ईको-फ्रेंडली बनाकर संस्कृति और पर्यावरण  दोनों की रक्षा करें।

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