छठ पूजा में नारंगी टीका – आस्था और भक्ति का महापर्व छठ पूजा आज से पूरे भारत में शुरू हो रहा है। यह एक ऐसा पर्व है जिसमें भक्त बिना जल पिए कठोर व्रत (निर्जला) रखते हैं, जिससे दुनिया अचंभित रह जाती है। इस पर्व के दौरान, व्रती महिलाएं (छठ करने वाली) पानी में खड़ी होकर उगते और डूबते सूर्य को अर्घ्य देती हैं, मानो प्रकृति के सबसे बड़े देवता को साष्टांग प्रणाम कर रही हों।
लेकिन क्या आपने कभी छठ के दौरान व्रती महिलाओं के श्रृंगार पर ध्यान दिया है? उनकी पारंपरिक सादगी में एक बात सबसे अलग दिखती है: नाक से माथे तक फैला नारंगी सिंदूर! आम दिनों में, हर विवाहित महिला लाल सिंदूर लगाती है, जो पति-पत्नी के अटूट प्रेम और सौभाग्य का प्रतीक है। तो, छठ पर यह नारंगी सिंदूर क्यों लगाया जाता है, और इसे नाक के इतने नीचे क्यों लगाया जाता है? आइए इस अनूठी परंपरा के पीछे की धार्मिक, वैज्ञानिक और पौराणिक कथाओं को जल्दी से जानें!
लाल और नारंगी सिंदूर में क्या अंतर है?
दीर्घायु और समृद्धि का प्रतीक (धार्मिक):
माना जाता है कि सिंदूर की यह लंबी रेखा पति की लंबी आयु और परिवार की सुख-समृद्धि का प्रतीक है। ऐसा कहा जाता है कि सिंदूर जितना लंबा और स्पष्ट दिखाई देता है, पति की प्रसिद्धि और उन्नति उतनी ही अधिक होती है।
सिंदूर की यह लंबी रेखा इस बात का प्रतीक है कि महिला पूरी श्रद्धा और विश्वास के साथ सूर्य देव को अर्घ्य दे रही है और अपने पति और परिवार की रक्षा के लिए प्रार्थना कर रही है।
पौराणिक कथाएँ: महाभारत काल में, जब द्रौपदी का चीरहरण हो रहा था, तो उन्होंने अपने बालों के बीच सिंदूर लगाया था। सिंदूर को वैवाहिक सुख और सुरक्षा का प्रतीक मानते हुए, छठ व्रती इसे अपनी नाक तक लगाती हैं, ताकि उनके पति और परिवार की सदैव रक्षा हो।
वैज्ञानिक कारण:
माथे पर जहाँ से सिंदूर शुरू होता है (नाक और माथे के बीच का क्षेत्र), योग और अध्यात्म में, आज्ञा चक्र या तृतीय नेत्र से जुड़ा हुआ है।
ऐसा माना जाता है कि सिंदूर लगाने से यह चक्र सक्रिय होता है। इससे महिलाओं को मानसिक शांति और शरीर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। यह उन्हें कठिन छठ व्रत के दौरान शक्ति प्रदान करता है।
यह अनोखी मान्यता आज भी कायम है।
हाँ, यह सच है कि समय बदल गया है, लेकिन छठ पूजा से जुड़ी ये पवित्र परंपराएँ आज भी वैसी ही हैं। घर की सफाई से लेकर पूजा की तैयारी और व्रत के दौरान नारंगी सिंदूर से विशेष श्रृंगार तक, हर चीज़ व्रती महिलाओं की अटूट आस्था, आत्मविश्वास और समर्पण की झलक पेश करती है।
तो इस बार जब आप किसी व्रती महिला को इस विशेष श्रृंगार में देखें, तो समझ लीजिए कि यह सिर्फ़ सजने-संवरने का तरीका नहीं, बल्कि सूर्य देव की पूजा का एक गहरा, पवित्र और सदियों पुराना अनुष्ठान है