स्वयंसेवक प्रधानमंत्री के सम्बोधन से गदगद है संघ के करोडों स्वयंसेवक

Saroj kanwar
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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना के सौ वर्ष पूरे होने से ठीक एक दिन पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने संघ की सौ वर्ष की यात्रा को रेखांकित करता डाक टिकट और सौ रुपए के सिक्के का विमोचन किया। संघ के स्वयंसेवकों के लिए संघ पर आधारित डाक टिकट और सिक्के का जारी होना ही अपने आप में अत्यन्त प्रसन्नता का विषय है,लेकिन इस मौके पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सम्बोधन ने देश विदेश में मौजूद लाखों स्वयंसेवको को गदगद कर दिया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इस कार्यक्रम को संघ के एक स्वयंसेवक के रुप में सम्बोधित कर रहे थे।

वैसे तो संघ के किसी प्रचारक का देश के सर्वोच्च पद तक पंहुचने का यह दूसरा मौका है। सबसे पहले स्व.श्री अटल बिहारी बाजपेयी देश के प्रधानमंत्री बने थे। स्व.अटल जी के सामाजिक जीवन की शुरुआत भी संघ प्रचारक के रुप में ही हुई थी,लेकिन पहले जनसंघ और फिर भाजपा में जाने के बाद वे प्रचारक नहीं थे। उस समय की राजनैतिक परिस्थितियों के चलते भाजपा और संघ कभी भी खुले रुप से इस तथ्य को स्वीकार नहीं करते थे कि दोनो संगठनो का कोई सम्बन्ध है। बहुत ज्यादा पूछे जाने पर यह कहा जाता था कि दोनो समविचारी संगठन है। इसके अलावा संवैधानिक पदों पर रहते हुए या सरकार मेंं रहते हुए भाजपा के नेता संघ के कार्यक्रमों आदि में खुले रुप से शामिल भी नहीं हुआ करते थे।

संघ और भाजपा की यह झिझक नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद समाप्त हुई। वर्ष 2014 में नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद संघ को लेकर भाजपा नेताओं की न सिर्फ झिझक दूर हुई बल्कि संघ की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा या समन्वय बैठकों में भाजपा अध्यक्ष की उपस्थिति भी अनिवार्य हो गई। इससे पहले भाजपा के केवल संगठन मंत्री इस तरह की बैठकों में भाग लेते थे।

नरेन्द्र मोदी के पहले कार्यकाल में संघ से दूर और अलग नजर आने की विवशता तो समाप्त हो गई थी,लेकिन शासकीय स्तर पर राष्ट्र भक्त संगठन के रुप में संघ को प्रतिष्ठित किए जाने का मामला दूर ही था। यह मौका नरेन्द्र मोदी के दूसरे कार्यकाल में आया,जब सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद अयोध्या में हुए मन्दिर के शिलान्यास कार्यक्रम में भारत के और संघ के इतिहास में पहली बार भारत के प्रधानमंत्री और संघ के सरसंघचालक ने मंच साझा किया। इसके बाद मन्दिर के प्राणप्रतिष्ठा समारोह में भी दोनो हस्तियां एक मंच पर मौजूद रही।

संघ के स्वयंसेवकों के लिए यह अवसर भी अविस्मरणीय था कि भारत के प्रधानमंत्री और संघ के सरसंघचालक एक मंच पर मौजूद थे। लेकिन इससे भी बडा अवसर अभी आना बाकी था। नई दिल्ली में संघ के नवीन मुख्यालय भवन के उद्घाटन अवसर पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और सरसंघचालक डा. मोहन भागवत फिर से एक साथ थे। इस मंच से प्रधानमंत्री मोदी ने संघ यात्रा पर अपना प्रभावशाली उद्बोघन दिया।

प्रधानमंत्री और सरसंघचालक की निकटता या कहें कि आपसी समन्वय भाजपा और संघ विरोधियों को भारी चुभ रहा था। येन केन प्रकारेण नरेन्द्र मोदी को कमजोर करने और किसी तरह भाजपा सरकार को अस्थिर करने के इच्छुक लोगों से यह बर्दाश्त ही नहीं हो रहा था कि नरेन्द्र मोदी और संघ के बीच में सबकुछ ठीक है। पहले के समय में यह हो चुका था कि किन्ही मुद्दों को लेकर संघ और भाजपा के बीच में मतभेद थे। मोदी विरोधियों को इस बार भी ऐसा ही कुछ होने की उम्मीद थी।

भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष के चयन में लगातार हो रही देरी ने भाजपा विरोधियों को एक मौका दे दिया। मीडीया के एक वर्ग ने तुरंत इस तरह की खबरें फैलाना प्रारंभ कर दिया कि संघ और भाजपा में एकराय नहीं बन पाने के कारण भाजपा अध्यक्ष का चयन नहीं हो पा रहा है। इसी के साथ प्रधानमंत्री की आयु 75 वर्ष होने को भी मुद्दा बनाया गया। कहा गया कि 75 वर्ष में पद छोड देने की व्यवस्था संघ ने ही बनाई है और संघ की ओर से नरेन्द्र मोदी पर पद छोडने का दबाव बनाया जा रहा है। संघ प्रमुख डा. भागवत के एक सम्बोधन को भी इसका आधार बनाया गया।

लेकिन इस पूरे विमर्श की हवा तब निकल गई,जब संघ प्रमुख डा. भागवत ने अपने दिल्ली प्रवास के दौरान पूरी तरह साफ कर दिया कि ना तो वे स्वयं पद छोडने वाले हैैं और ना ही उन्होने किसी को पद छोडने को कहा है। मजेदार बात यह है कि प्रधानमंत्री नेरन्द्र मोदी और सरसंघचालक डा. मोहन भागवत दोनो का ही जन्मदिन एक ही महीने में आता है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का जन्मदिन 17 सितम्बर 1950 को है तो संघ प्रमुख डा.भागवत का जन्मदिन 11 सितम्बर 1950 को । यानी भागवत जी का जन्मदिन मोदी जी के जन्मदिन से पांच दिन पहले आता है। यह भी देश के इतिहास में पहली बार हुआ कि सर संघचालक डा. मोहन भागवत के जन्मदिन के अवसर पर देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उनकी देशसेवा और जीवन पर एक लेख लिखा। प्रधानमंत्री का यह लेख देश के तमाम समाचार पत्रों में विभिन्न भाषाओं में प्रकाशित हुआ। प्रधानमंत्री के इस लेख ने संघ और मोदी के बीच में खटपट की खबरें ढूंढने वालों को बुरी तरह निराश कर दिया।

इतना सबकुछ होने तक भी वैसा नहीं हुआ था,जैसे संघ के डाक टिकट और सिक्के को जारी करते वक्त हुआ। इस कार्यक्रम में संघ के सर कार्यवाह दत्तात्रैय होसवाले उपस्थित थे,लेकिन सरसंघचालक डा.भागवत नहीं थे। समारोह के मुख्य अतिथी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी थे। इस समारोह को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने प्रधानमंत्री के रुप में नहीं बल्कि एक स्वयंसेवक के रुप में सम्बोधित किया। संघ संस्थापक डा.हेडगेवार जी और द्वितीय सरसंघचालक गुरुजी गोलवलकर का प्रधानमंत्री ने ठीक वैसे ही उल्लेख किया जैसे कि स्वयंसेवक करते है। संघ के स्वयंसेवक जब भी आद्य सरसंघचालक डा. हेडगेवार या द्वितीय सरसंघचालक गुरुजी का उल्लेख करते है,तो उनके नाम के साथ परम पूजनीय शब्द जरुर लगाते है। स्वयंसेवक के इस उल्लेख से ही स्पष्ट हो जाता है कि उसके मन में संघ कितना गहरा पैठा हुआ है। भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी अपने सम्बोधन में जब जब डा. हेडगेवार जी और गुरुजी का उल्लेख किया उन्होने परम पूजनीय शब्द के साथ ही किया।

इतना ही नहीं मोदी जी ने संघ की सौ वर्षों की यात्रा का जिस तरीके से वर्णन किया उन्हे सुनने वाले प्रत्येक स्वयंसेवक को यही आभास हुआ कि वे किसी राजनेता को नहीं बल्कि संघ के किसी वरिष्ठ प्रचारक का सम्बोधन सुन रहे है। इतना ही नहीं भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने सम्बोधन के दौरान कई बार यह स्पष्ट किया कि वे आज भी संघ के स्वयंसेवक है और यही वजह है कि संघ के स्वयंसेवक इससे बेहद हर्षित है। इसी वजह से यह संघ के भी और देश के भी इतिहास का पहला अवसर है जब अधिकारिक स्तर पर संघ की देशसेवा को मान्यता मिल गई है। 

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