टोल कर अपडेट: भारत के सड़क बुनियादी ढांचे के तेजी से विस्तार के साथ-साथ टोल करों से प्राप्त राजस्व में भी लगातार वृद्धि हो रही है और नए रिकॉर्ड बन रहे हैं। सरकारी अनुमानों के अनुसार, वित्त वर्ष 2026-27 में टोल संग्रह पहली बार 1 लाख करोड़ रुपये का आंकड़ा पार कर सकता है। यह न केवल एक वित्तीय उपलब्धि होगी, बल्कि यह भी साबित करेगी कि टोल कर सरकार के लिए एक मजबूत और स्थायी राजस्व स्रोत बन गया है।
राजमार्ग नेटवर्क के विस्तार के कारण बदलता परिदृश्य
हाल के वर्षों में, भारत ने अपने राष्ट्रीय राजमार्ग और एक्सप्रेसवे नेटवर्क का तीव्र विस्तार देखा है। नए राजमार्गों के निर्माण और मौजूदा मार्गों के उन्नयन से वाहनों की आवाजाही में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। आवाजाही बढ़ने के साथ ही टोल प्लाजा से प्राप्त राजस्व में भी कई गुना वृद्धि हुई है। वर्तमान में, देश भर में एक हजार से अधिक सक्रिय टोल प्लाजा हैं, जिनमें से कई प्रतिदिन करोड़ों रुपये एकत्र करते हैं।
वित्त वर्ष 2024 और 2025 के आंकड़ों से संकेत
वित्त वर्ष 2023-24 में, भारत का कुल टोल संग्रह लगभग ₹64,800 करोड़ तक पहुंच गया, जो पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 35 प्रतिशत अधिक था। वित्त वर्ष 2025 में इस आंकड़े में और वृद्धि होने का अनुमान था। इन आंकड़ों से पहले ही संकेत मिल गया था कि आने वाले वर्षों में टोल कर सरकारी राजस्व का एक महत्वपूर्ण स्तंभ बन जाएगा।
FASTag ने टोल वसूली में क्रांतिकारी बदलाव लाया
टोल वसूली में हुई तीव्र वृद्धि का मुख्य कारण FASTag और डिजिटल भुगतान प्रणाली है। नकद भुगतान के स्थान पर FASTag के प्रचलन से टोल प्लाजा पर प्रतीक्षा समय में कमी आई है और वसूली प्रक्रिया अधिक पारदर्शी हो गई है। सरकार की योजना के अनुसार, 1 अप्रैल, 2026 से टोल प्लाजा पर नकद भुगतान लगभग पूरी तरह से बंद कर दिया जाएगा, जिससे टोल वसूली और भी सुव्यवस्थित हो जाएगी।
MLFF प्रणाली से राजस्व में और वृद्धि
सरकार भविष्य में उपग्रह आधारित मल्टी-लेन फ्री फ्लो (MLFF) प्रणाली लागू करने की तैयारी कर रही है। यह तकनीक वाहनों को बिना रुके चलते-फिरते टोल का भुगतान करने की सुविधा देगी। इससे न केवल यातायात जाम कम होगा, बल्कि टोल वसूली क्षमता में भी कई गुना वृद्धि होने की उम्मीद है।
टोल से एकत्रित धन का उपयोग कहाँ होता है?
टोल टैक्स से प्राप्त धन सीधे सरकारी खजाने में नहीं जाता, बल्कि इसका उपयोग सड़क नेटवर्क के निर्माण, रखरखाव और विकास तथा नई अवसंरचना परियोजनाओं के लिए किया जाता है। इससे नए राजमार्गों, एक्सप्रेसवे और पुलों के निर्माण में सहायता मिलती है। इसके अतिरिक्त, इस निधि का एक हिस्सा पुराने ऋणों के भुगतान और निजी कंपनियों को भुगतान करने में भी उपयोग किया जाता है।
पीपीपी मॉडल में सरकार और निजी क्षेत्र की भागीदारी
भारत में कई टोल प्लाजा सार्वजनिक-निजी भागीदारी (पीपीपी) मॉडल के तहत संचालित होते हैं। इस मॉडल में, सरकार नीतियां और नियम निर्धारित करती है, जबकि निजी कंपनियां सड़क निर्माण और टोल संचालन की जिम्मेदारी लेती हैं। इससे सरकार पर वित्तीय बोझ कम होता है और बड़े बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को समय पर पूरा करना आसान हो जाता है।