पटपड़गंज का वो कोर्टरूम एक बार फिर गुलजार है—वो जगह जहाँ वकीलों की चतुराई और गहरी भावनाएँ अक्सर कानून की किताबों से भी ज़्यादा मायने रखती हैं। अगर आप भी रवि किशन के ‘वीडी त्यागी’ किरदार के दीवाने हैं, तो मामला लीगल है सीज़न 2 की ये समीक्षा आपके लिए ही है।
पेश है इस वेब सीरीज़ की एक बिल्कुल देसी और जोशीली समीक्षा:
मामला लीगल है सीज़न 2 समीक्षा: क्या वीडी त्यागी जज की कुर्सी से भी अपना जादू बिखेर पाए?
जब मामला लीगल है पहली बार 2024 में प्रसारित हुआ था, तो पटपड़गंज कोर्ट की इन अनोखी कहानियों ने सबका दिल जीत लिया था। अब इसका दूसरा सीज़न नेटफ्लिक्स पर आ चुका है। लेकिन क्या इसमें अभी भी वही पुराना जादू बरकरार है? आइए जानते हैं।
कहानी: वकीलों का ‘शेर’ अब बन चुका है ‘माननीय न्यायाधीश’
सीज़न 2 की शुरुआत विश्वेश्वर दयाल उर्फ वी.डी. त्यागी (रवि किशन) के शपथ ग्रहण समारोह से होती है। त्यागी जी ने अब वकीलों का काला चोला उतारकर जिला न्यायाधीश की कुर्सी संभाल ली है। इस बार कहानी वकीलों के संघर्षों पर कम और न्यायाधीश की जिम्मेदारियों और न्यायिक पद की अंतर्निहित सीमाओं पर अधिक केंद्रित है।
यह श्रृंखला दर्शाती है कि न्यायाधीश बनने के बाद आप अपने पुराने दोस्तों (वकीलों) के साथ समोसे नहीं खा सकते, न ही उनके चुटकुलों पर खुलकर हंस सकते हैं। एक ओर त्यागी जी व्यवस्था में सुधार के लिए प्रयासरत हैं, वहीं दूसरी ओर उनके पुराने कक्ष में लखमीर मिंटू (अंजुम बत्रा) और सुजाता दीदी (निधि बिष्ट) के बीच ‘सर्वोच्चता’ की जंग छिड़ी हुई है। इसी बीच, अनन्या श्रॉफ (नैला ग्रेवाल) हार्वर्ड में सीखे अपने आदर्शों से प्रेरित होकर न्याय की अपनी खोज जारी रखती है।
सीरीज़ की मुख्य विशेषताएं: क्या चीज़ें असरदार हैं?
रवि किशन का जादू: सच कहें तो, पूरी सीरीज़ रवि किशन के कंधों पर टिकी है। उन्होंने एक गंभीर जज की गरिमा और एक देसी इंसान के सहज आकर्षण के बीच बड़ी कुशलता से संतुलन बनाया है। दिनेश लाल यादव (निरहुआ) और दिव्येंदु भट्टाचार्य: इस बार निरहुआ ने ‘वनस्पति जी’ की भूमिका में अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज कराई है, वहीं दिव्येंदु भट्टाचार्य के रहस्यमय किरदार ने सीरीज़ में एक दिलचस्प मोड़ ला दिया है।
अनोखे मामले: यह सीरीज़ पुरुषों के साथ छेड़छाड़ से जुड़े कानूनों से लेकर संपत्ति विवाद और पारिवारिक रिश्तों तक के कई रोचक मुद्दों को उठाती है—ऐसे विषय जो आपको सोचने पर मजबूर कर देते हैं।
इसमें कमियां कहां रह गईं?
सीज़न 1 की खासियत रही ‘मज़ेदार’ बातें—खासकर वकीलों के बीच पेशेवर टकराव और अदालत में होने वाली जिरह—इस बार कुछ फीकी सी लगती हैं। जज के निजी जीवन पर ज़्यादा ध्यान देने की वजह से वकीलों की कहानी (खासकर मिंटू और सुजाता के बीच का टकराव) थोड़ी खिंची हुई और दोहराव वाली लगती है। निर्माताओं ने अनन्या और नैना (कुशा कपिला) की दुश्मनी को भी अधूरा और अनसुलझा छोड़ दिया है।
क्या कानून वाकई बदल गए हैं?
लेख में उल्लेख किया गया है कि “पुरुषों के साथ छेड़छाड़ से संबंधित कोई कानून नहीं है।” सच्चाई यह है कि भारतीय न्याय संहिता (BNS) और पूर्ववर्ती आईपीसी, दोनों के तहत यौन उत्पीड़न से संबंधित अधिकांश कानून मुख्य रूप से महिलाओं की सुरक्षा पर केंद्रित हैं। हालांकि, हाल के कानूनी विमर्श में ‘लिंग-तटस्थ’ कानूनों की बढ़ती मांग देखी गई है – एक ऐसा भाव जिसे इस श्रृंखला ने बखूबी दर्शाया है।
देखें या न देखें?
यदि आप रवि किशन के देसी व्यंग्य और हल्के-फुल्के कोर्टरूम ड्रामा के प्रशंसक हैं, तो नेटफ्लिक्स पर यह श्रृंखला एक बार जरूर देखने लायक है। हालांकि इस सीज़न में पिछले सीज़न जैसी ‘कानूनी सनसनी’ न हो, फिर भी यह सप्ताहांत मनोरंजन के लिए एक बढ़िया विकल्प है।