बिहार के टिफिन बॉक्स से वैश्विक उद्योगपति बने अनिल अग्रवाल, जानिए उनकी सफलता का सफर

Saroj kanwar
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अनिल अग्रवाल की सफलता की कहानी: बिहार के पटना से निकलकर वैश्विक उद्योगपति बने अनिल अग्रवाल अब वेदांता समूह के अध्यक्ष हैं। फोर्ब्स की जुलाई 2025 की सूची के अनुसार, उनकी संपत्ति ₹35,000 करोड़ तक पहुँच गई है, जिससे वे बिहार के सबसे अमीर व्यक्ति बन गए हैं। हुरुन इंडिया रिच लिस्ट 2025 में उन्हें 16वाँ और एनआरआई वेल्थ क्रिएटर्स सूची में चौथा स्थान प्राप्त है। उनकी सफलता की कहानी यह साबित करती है कि दृढ़ संकल्प और कड़ी मेहनत से कोई भी सपना साकार किया जा सकता है।

एक टिफिन बॉक्स से शुरू हुआ सफ़र

1954 में पटना में जन्मे अनिल अग्रवाल एक साधारण मारवाड़ी परिवार में पले-बढ़े। आर्थिक तंगी के कारण, उन्होंने 19 साल की उम्र में स्कूल छोड़ दिया और मुंबई चले गए। अपने शुरुआती दिनों में, उन्होंने नौ अलग-अलग व्यवसायों में हाथ आजमाया, लेकिन कई बार असफल रहे। उनके कभी हार न मानने वाले रवैये ने उन्हें 1976 में वेदांता समूह की स्थापना करने के लिए प्रेरित किया।

उन्होंने स्क्रैप मेटल के व्यापार से अपना करियर शुरू किया, जिससे उन्हें इस उद्योग की गहरी समझ मिली। 1986 में, उन्होंने स्टरलाइट इंडस्ट्रीज की स्थापना की और 1993 में भारत का पहला निजी तांबा प्रगलन संयंत्र और रिफाइनरी स्थापित की। उनकी सबसे बड़ी सफलताएँ 2001 में बाल्को और फिर हिंदुस्तान ज़िंक का अधिग्रहण थीं। इन प्रयासों ने उन्हें उद्योग में “धातु सम्राट” की उपाधि दिलाई।

वेदांत समूह का वैश्विक पदार्पण

आज, वेदांत समूह जस्ता, तांबा, एल्युमीनियम, चांदी, बिजली, लोहा, इस्पात और तेल एवं गैस सहित कई क्षेत्रों में कार्यरत है। अनिल अग्रवाल के नेतृत्व में, कंपनी ने अंतर्राष्ट्रीय बाजार में उल्लेखनीय विस्तार किया है और सेमीकंडक्टर तथा डिस्प्ले ग्लास निर्माण में निवेश किया है, जिससे भारत के “मेक इन इंडिया” मिशन को नई गति मिली है।
अग्रवाल का समाज सेवा का दृष्टिकोण

अपने व्यवसाय के साथ-साथ, अनिल अग्रवाल सामाजिक कार्यों में भी सक्रिय रूप से शामिल हैं। उन्होंने अपनी 75% संपत्ति सामाजिक कार्यों के लिए दान करने का संकल्प लिया है और द गिविंग प्लेज के सदस्य हैं। उनकी प्रमुख परियोजना, नंद घर, देश भर में आंगनवाड़ियों का आधुनिकीकरण, बच्चों को पोषण प्रदान करना और महिलाओं को कौशल प्रशिक्षण एवं शिक्षा प्रदान करना है।

“विनम्र बनो, डरो मत।”

अनिल अग्रवाल का मानना ​​है कि असफलता से डरना नहीं चाहिए, बल्कि उसे सीखने का एक अवसर मानना ​​चाहिए। वह अक्सर युवाओं से कहते हैं, “विनम्र बनो, निडर बनो।” आज, वह न केवल एक सफल उद्योगपति हैं, बल्कि उन लाखों युवाओं के लिए प्रेरणा भी बन गए हैं जो सीमित संसाधनों के बावजूद बड़े सपने देखने का साहस रखते हैं।

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