पार्वती–काली सिंध-चंबल लिंक: छोटे किसानों के हित और बड़े बदलाव के बीच विवाद

Saroj kanwar
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Guna News: पार्वती-काली सिंध-चंबल लिंक परियोजना के तहत कुंभराज के घाटाखेड़ी में प्रस्तावित बांध को लेकर इलाके में विवाद तेज हो गया है। विरोधी ग्रामीणों का आरोप है कि परियोजना से व्यापक विस्थापन होगा और स्थानीय खेमे की खेती योग्य ज़मीन डूबेगी। दूसरी ओर परियोजना संचालक विभाग का कहना है कि यह परियोजना इलाके की तस्वीर बदल देगी और मरुस्थलीकरण रोकने में अहम साबित होगी। नीचे परियोजना के प्रमुख पहलुओं और दोनों पक्षों की दलीलों का संक्षेप प्रस्तुत है।

परियोजना का स्वरूप और उद्देश्य
घाटाखेड़ी में प्रस्तावित बांध की अधिकतम ऊँचाई करीब 30 मीटर और कुल लम्बाई लगभग 5 किलोमीटर होने का अनुमान है। इस जलसंरचना से लगभग 430 गांवों को पानी उपलब्ध कराया जाएगा और करीब 1 लाख हेक्टेयर क्षेत्र सिंचित होगा। परियोजना का उद्देश्य चांचौड़ा ब्लॉक की पूरी भूमि तथा राघौगढ़ के बड़े हिस्सों को सिंचाई और पीने के पानी से जोड़ना है। साथ ही इसका लक्ष्य स्थानीय कृषि उत्पादन बढ़ाकर पलायन रोकना तथा औद्योगिक विकास के लिए जल उपलब्ध कराना भी बताया जा रहा है।

क्यों बदला गया प्रारूप — दो बांध की जगह एक बड़े बांध का प्रस्ताव
पहले परियोजना में पार्वती नदी पर दो छोटे बांध बनाने का प्रस्ताव था, पर तकनीकी और भूगोलिक कारणों के चलते वह स्कीम संशोधित होकर एक बड़े बांध के रूप में सामने आई। परियोजना टीम का कहना है कि सीमा की ओर नदी का ढाल कम होने तथा बाढ़ के दौरान जल निकासी संबंधी समस्याओं के कारण दो बांध व्यवहारिक नहीं थे। साथ ही नए आकलन में अतिरिक्त जल उपलब्धता के कारण एक बड़े बांध से अधिक क्षेत्रों में स्थायी सिंचाई सुनिश्चित हो सकेगी — अनुमानित लाभक्षेत्र अब लगभग एक लाख हेक्टेयर तक पहुँचता है जो छोटे बांधों के संयोजन से संभव नहीं था।

डूब क्षेत्र, विस्थापित गांव और प्रभावित परिवार
प्रस्तावित आंकड़ों के मुताबिक केवल 16 गाँव पूरी तरह जल संवरण क्षेत्र में आएँगे और लगभग 4,192 परिवारों की जांच में आए स्थानीय निवास शामिल हैं। इसके अलावा 6 गांव आंशिक रूप से प्रभावित होंगे और करीब 46 गाँवों की कुछ कृषि योग्य ज़मीन डूब क्षेत्र में आ सकती है। विभाग का दावा है कि कुल मिलाकर केवल लगभग 7% कृषि योग्य भूमि ही जलमग्न होगी; शेष 93% भूमि को परियोजना से प्रत्यक्ष सिंचाई लाभ मिलेगा और कृषि उत्पादन दोगुना या इससे भी अधिक बढ़ने की उम्मीद जताई जा रही है — किसान साल में 2–3 फसल तक कर सकेंगे।

पुनर्वास और मुआवजा नीति — क्या वादा साकार होगा?
परियोजना प्रबंधन ने स्पष्ट किया है कि जो लोग भूमि खो देंगे उन्हें बाजार दर से दोगुना भुगतान किया जाएगा। भू-अधिग्रहण कानून के प्रावधानों का पालन करने और प्रभावितों के पुनर्वास के लिए विशेष योजना बनाने का आश्वासन भी दिया गया है। विभाग का दावा है कि यह पुनर्वास योजना ऐसी होगी जो देश-स्तर पर मिसाल बन सके — यानी आवासीय सुविधाएँ, बुनियादी सेवाएँ और आजीविका के विकल्प दिए जाएंगे। हाल के दशकों में अन्य परियोजनाओं की गलतियों से सीख लेकर नई योजना में उन कमियों को दूर करने की कोशिश की जा रही है, यह भी बताया गया है।

विरोध के कारण और समझाने का प्रयास
विरोध करने वालों का मुख्य आरक्षण यह है कि उन्हें परियोजना के सभी पहलुओं के बारे में पर्याप्त जानकारी नहीं दी गई है और इसी असमंजस के कारण चिंता फैली है। विभाग का कहना है कि लोगों को यह समझाने की ज़रूरत है कि इस परियोजना से केवल कुछ हिस्से डूबेंगे, जबकि बड़े पैमाने पर सिंचित भूमि, बढ़ती फसल उपज और रोजगार के कारण पलायन घटेगा और आसपास के गांवों को दीर्घकालिक लाभ मिलेगा। साथ ही औद्योगिक निवेश के अवसर खुलने से क्षेत्र में रोजगार के नए साधन भी बनेंगे।

आर्थिक लागत और वितरण
परियोजना की अनुमानित लागत लगभग 5,118 करोड़ रुपए बताई जा रही है। इसमें से बांध निर्माण और प्रेशराइज्ड पाइपलाइन पर लगभग 3,000 करोड़ खर्च होने का अनुमान है, जबकि लगभग 1,200 करोड़ रुपए भू-अर्जन और पुनर्वास के लिए अलग रखे गए हैं। योजनाकारों का कहना है कि जल उपलब्धि घाटाखेड़ी से लेकर राजस्थान की सीमा तक 30 किलोमीटर दूर तक सिंचाई के लिए पहुँचाई जाएगी, जिससे सीमावर्ती क्षेत्रों को भी फायदा मिलेगा।

प्रमुख चिंताएँ जिनका समाधान आवश्यक है
* पारिस्थितिकी और पारंपरिक भूमि उपयोग पर प्रभाव — स्थानीय जैव-विविधता और जमीन के लंबे समय के उपयोग में बदलाव के संभावित परिणामों का अध्ययन जरूरी है।
* वास्तविक मुआवजे और पुनर्वास की पारदर्शिता — मुआवजे का सही क्रियान्वयन तथा प्रभावितों के लिए उपलब्ध कराए जाने वाले विकल्पों की स्पष्ट सूची और समयबद्धता चाहिए।
* सामाजिक परामर्श और जानकारी साझा करना — लोगों को परियोजना के तकनीकी-आर्थिक लाभ तथा संभावित नुकसानों की पूरी जानकारी देने के लिए नियमित जनसभा, लिखित सामग्री और स्वतंत्र समीक्षा की व्यवस्था हो।
* आपदा प्रबंधन — बाढ़ जैसी आपदा की स्थिति में पानी की निकासी और जलप्रबंधन के ठोस प्राविधान होने चाहिए।

क्या अगले कदम क्या होंगे?
प्रस्ताव के अनुसार परियोजना को प्रशासनिक मंज़ूरी मिल चुकी है और तकनीकी जाँच के बाद टेंडर जारी होने की प्रक्रिया है। अधिकारियों ने संकेत दिया है कि निकट भविष्य में आगे की औपचारिकताएँ पूरी कर कार्य आरम्भ की दिशा में कदम उठाए जाएंगे।

यह परियोजना एक ओर इलाके के वृहद विकास और सिंचाई-सम्मत बदलाव का वादा करती है, वहीं दूसरी ओर इससे जुड़ा विस्थापन और पर्यावरणीय प्रभाव गम्भीर चिंता का विषय है। संतुलित और पारदर्शी पुनर्वास योजना, प्रभाव का सटीक आकलन और प्रभावितों की भागीदारी ही इस परियोजना को लोकहित में परिवर्तित कर सकती है।

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