दुनिया में छाई भारत की स्टील सड़क तकनीक, अरबों डॉलर के बाजार में खुले नए रोजगार के रास्ते

Saroj kanwar
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Steel Slag Roads: भारत में विकसित स्टील स्लैग तकनीक अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बना रही है। इस तकनीक का उपयोग अब अमेरिका के शिकागो और ओमान जैसे देशों में भी सड़क निर्माण के लिए किया जा रहा है। यह तकनीक वैज्ञानिक व औद्योगिक अनुसंधान परिषद (CSIR) और सेंट्रल रोड रिसर्च इंस्टीट्यूट (CRRI) द्वारा विकसित की गई है, जो सड़क निर्माण की पारंपरिक विधियों की तुलना में अधिक टिकाऊ और किफायती साबित हो रही है।

विशेषज्ञों का मानना है कि स्टील स्लैग रोड भारत की सड़कों के भविष्य के लिए एक क्रांतिकारी कदम है। इससे देश की सर्कुलर इकॉनॉमी को मजबूती मिलेगी और वर्ष 2050 तक इसका वैश्विक बाजार $2 ट्रिलियन से भी अधिक हो सकता है। इसके जरिए करीब 1 करोड़ नए रोजगार पैदा होने की संभावना है।

सड़क निर्माण में आमतौर पर बड़ी मात्रा में प्राकृतिक एग्रीगेट (रोड़ी-बजरी) की जरूरत होती है, जिसकी सालाना खपत 1.2 बिलियन टन के करीब है। इसके लिए खनन की जाती है, जिससे पर्यावरण पर भारी दबाव पड़ता है। लेकिन स्टील स्लैग तकनीक प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग को कम करके पर्यावरण संरक्षण में मदद करती है।

इस तकनीक से बनी सड़कें सामान्य सड़कों की तुलना में 30 से 40% सस्ती होती हैं और तीन गुना ज्यादा टिकाऊ होती हैं। जहां पारंपरिक सड़कों में चार-पांच साल में मरम्मत की जरूरत पड़ती है, वहीं स्टील स्लैग से बनी सड़कें 12 साल तक बिना रिपेयर चल सकती हैं।

भारत में हर साल 19 मिलियन टन से ज्यादा स्टील स्लैग तैयार होता है, जिसे पहले वेस्ट माना जाता था। अब इसका प्रोसेस कर उपयोग करने की तकनीक देश की एक अग्रणी स्टील कंपनी ने लाइसेंस के तहत अपनाई है, जो सड़क निर्माण में इसका इस्तेमाल कर रही है। कंपनी को सीएसआईआर और सीआरआरआई से यह तकनीक उपयोग करने की स्वीकृति मिल चुकी है।

सड़क विकास में इस तकनीक के उपयोग से न केवल ‘वेस्ट-टू-वेल्थ’ की दिशा में कदम बढ़ेगा, बल्कि यह भारत के नेट जीरो लक्ष्य में भी अहम योगदान देगा। सरकार की योजना है कि साल 2030 तक देश की स्टील उत्पादन क्षमता को 300 मिलियन टन तक पहुंचाया जाए। ऐसे में स्टील स्लैग का उपयोग इंफ्रास्ट्रक्चर में और भी बढ़ेगा।

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