छोटे पैक, बड़ा फ़ायदा, क्यों 5 और 10 रुपये के पैकेट FMCG का आधार बने हुए हैं

Saroj kanwar
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FMCG: चाय के साथ बिस्किट हो या बच्चों के लिए छोटी चॉकलेट।अक्सर पांच या दस रुपये वाले पैकेट ही हाथ लगते हैं। यह केवल सस्ता दाम नहीं, बल्कि भारतीय FMCG बाजार की एक रणनीति बन गया है। बड़ी कंपनियाँ भी इन दो प्राइस-पॉइंट्स पर टिके रहने के पीछे ठोस कारण समझकर चलती हैं।

सबसे पहले, ये दाम उपभोक्ता के लिए सहज हैं। ज्यादातर लोग बिना सोचे-समझे पैसे देने को तैयार हो जाते हैं। खासकर छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों में, जहाँ नकद खरीदारी आम है। इससे खरीदने में झिझक कम रहती है और बिक्री निरंतर बनी रहती है।

दूसरा कारण सप्लाई-चेन का हिसाब है। पैकेजिंग साइज, कार्टन-कंटेनिंग, शेल्फ-स्पेस और डिस्ट्रिब्यूशन नेटवर्क सब कुछ इन्हीं प्राइस-पॉइंट्स के हिसाब से सेट होता है। रिटेलर के लिए छोटे पैक जल्दी बिकते हैं और बार-बार रिप्लेनिशमेंट की सुविधा देते हैं, इसलिए वे इन्हें प्राथमिकता से रखते हैं। कंपनियों को भी वॉल्यूम-स्ट्रैटेजी से कम मार्जिन पर ज्यादा यूनिट बेचकर लाभ मिलता है।

तीसरा यहाँ ब्रांड-लॉयल्टी नाम से कम और प्राइस-लॉयल्टी ज़्यादा मायने रखती है। ग्राहक आम तौर पर उसी ब्रांड को चुनते हैं जो उन्हें वांछित दाम पर मिलता रहे; अगर कोई ब्रांड कीमत बढ़ा दे तो ग्राहक तुरंत सस्ते विकल्प पर चला जाता है। इसलिए पुरानी कंपनियाँ दशकों से 5 और 10 रुपये के पैक्स बनाकर रखती हैं, ताकि उनके उत्पाद छात्रों, मजदूरों और परिवारों तक आसानी से पहुँचते रहें।

कई बार कंपनियाँ सीधे कीमत नहीं बढ़ातीं; वे पैक का वजन बढ़ाकर या सामग्री-मिश्रण में हल्की-फुल्की तब्दीली करके वैल्यू बनाए रखती हैं। टैक्स-बढ़ोतरी या कच्चे माल की लागत पर भी यही रणनीति काम आती है। ग्राहक को लगे कि उसे बेहतर वैल्यू मिल रही है।

धीरे-धीरे 10 रुपये एक नया माइक्रो-नॉर्म बन गया है; स्नैक्स, बेसिक पर्सनल-केयर और छोटे टॉयलेट्री आइटम इसी रेंज में दिखते हैं। इससे FMCG कंपनियाँ ग्रामीण और शहरी दोनों बाजारों में अपनी पकड़ और मजबूत कर रही हैं।

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