छठ पूजा खरना विधि – छठ महापर्व की बात ही कुछ और है। यह चार दिनों का व्रत नहीं, बल्कि पवित्रता, भक्ति और अटूट आस्था का पर्व है। इसे भारतीय संवाद शैली, “खूब मस्ती” और “पूरी एकाग्रता” के साथ मनाया जाता है! खोज परिणामों के अनुसार, छठ पूजा 2025 में 25 अक्टूबर से शुरू होकर 28 अक्टूबर को समाप्त होगी।
आपका लेख आज (अक्टूबर 2025) के संदर्भ में सटीक है, जहाँ खरना 26 अक्टूबर, 2025 (रविवार) को मनाया जा रहा है। योगों की जानकारी पंचांग के अनुसार है, और खरना की विधि, प्रसाद और महत्व भी मान्यताओं पर आधारित हैं, जो पूरी तरह से सत्य हैं।
छठ महापर्व: आज है ‘खरना’, 36 घंटे के निर्जला व्रत की तैयारियाँ!
छठ अनोखा है। नहाय-खाय के बाद, आज छठ के महापर्व का दूसरा दिन है, जिसे सभी ‘खरना’ या ‘लोहंडा’ कहते हैं। यह दिन अन्य त्योहारों से अलग है—यह केवल एक व्रत नहीं, बल्कि तन, मन और आत्मा की शुद्धि का एक महाअभियान है। व्रती आज शाम विशेष प्रसाद ग्रहण करने के बाद 36 घंटे का निर्जला व्रत रखने का संकल्प लेते हैं।
खरना क्यों खास है?
छठ पूजा सूर्य देव और छठी मैया को समर्पित एक पर्व है। माताएँ अपनी संतान की लंबी आयु और सुख-समृद्धि के लिए यह कठिन व्रत रखती हैं। खरना शब्द का शाब्दिक अर्थ है तपस्या के बाद आत्म-शुद्धि। यह दिन इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि ऐसी मान्यता है कि इस दिन छठी मैया व्रतियों के घर में प्रवेश करती हैं और उन्हें अपना आशीर्वाद प्रदान करती हैं।
आज खरना पर 4 शुभ योगों का अद्भुत संयोग!
आज का दिन और भी खास है! पंचांग के अनुसार, खरना पर 4 अत्यंत शुभ योग बन रहे हैं:
सर्वार्थ सिद्धि योग: सभी प्रयासों को सफल बनाने वाला।
रवि योग: सभी दोषों का निवारण करने वाला।
शोभन योग: सौभाग्य और शांति प्रदान करने वाला।
नवपंचम राजयोग: बृहस्पति और बुध की शुभ युति से बनने वाला यह योग सभी प्रयासों में सफलता दिलाने वाला माना जाता है।
कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि आज (27 अक्टूबर को प्रातः 6:04 बजे तक) रहेगी, जिसके बाद षष्ठी तिथि प्रारंभ होगी।
खरना का अद्भुत वातावरण और प्रसाद!
खरना के दिन, भक्त पूरे दिन उपवास रखते हैं और सूर्यास्त के बाद ही तैयारी और पूजा करते हैं।
प्रसाद की शुद्धता: प्रसाद तैयार करने के लिए अक्सर नए मिट्टी के चूल्हे और आम की लकड़ी का इस्तेमाल किया जाता है, क्योंकि इन्हें सबसे शुद्ध माना जाता है।
प्रसाद की तैयारी: आमतौर पर गुड़-चावल की खीर (जिसे ‘रसियाव’ भी कहा जाता है), गेहूँ के आटे की रोटी या पूरी, और केले तैयार किए जाते हैं।
विधि: प्रसाद तैयार होने के बाद, इसे केले के पत्ते पर छठी मैया और सूर्य देव को अर्पित किया जाता है।
व्रत तोड़ना: व्रती महिला पहले स्वयं यह प्रसाद ग्रहण करती है, और फिर इसे परिवार और मित्रों में बाँटती है। यही वह क्षण है जब अगले 36 घंटों का कठोर निर्जला व्रत शुरू होता है।
गुड़ की खीर की सुगंध पूरे वातावरण में फैल जाती है, महिलाओं द्वारा गाए जाने वाले पारंपरिक छठ गीत (जैसे “काँच ही बाँस के बहंगिया”) और बच्चों की मस्ती इस दिन को न केवल एक धार्मिक बल्कि एक सांस्कृतिक उत्सव भी बनाती है जो पूरे परिवार को एकजुट करता है। इस खरना प्रसाद को ग्रहण कर व्रती महिला अगले दो दिनों के लिए खुद को शारीरिक और मानसिक रूप से तैयार करती है।