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बकरी पालन करके कमा सकते है लाखो रूपये ,बीमारियों से सुक्षा करेगा ये एक टिका
 

ग्रामीण इलाकों में बकरी पालन एक लाभकारी व्यवस्या  के रूप में उभरा है  आजकल छोटे किसान खेती के साथ बकरी का पालन करकेअपनी आय बढ़ा रहे है इस बिजनेस की खास बात यह है कि इससे कम निवेश पर अधिक लाभ  कमाया जा सकता है बकरी के दूध और मांस की काफी मांग रहती है बकरी का दूध कई प्रकार की बीमारियां ठीक करने में सहायक है इसे देखते बकरी का पालन  लाभ का सौदा साबित हो रहा है यदि आप बकरी का पालन करते हैं या करना चाहते हैं अब आप को बकरी  की स्वास्थ्य सुरक्षा संबंधी जानकारी होना जरूरी है इसके लिए आपको बकरियों में होने वाले रोग और बचाव के उपाय भी पता होने चाहिए ताकि आपको इस बिजनेस से अधिक लाभ हो सके आज हम आपको बताते हैं किसानों को बकरी में होने वाली बीमारियों और सुरक्षा कैसे करनी है। 

 बकरी में बहुत से ऐसे रोग होते है  जो काफी घातक होते हैंअगर इन रोगो  का समय पर इलाज नहीं किया गया तो उनकी मौत भी हो सकती है बकरियोंको टिके के लगवानी चाहिए ताकि संभावित रोगो आने से बचा जा सके। 

1 बकरियों में पीपीआर रोग यह विषाणु जनित रोग है कि  यह किसी उम्र की बकरी में हो सकता हैबकरियों में इस रोग का संक्रमण दूषित हवा, पानी और भोजन से होता है इस रोग से पीड़ित बकरियों में बुखार,नाक से पानी का बहना, पतली दस्त ,मुंह में छाले पड़ना आदि लक्षण है यह रोग पीड़ित पशु से स्वस्थ पशुओं में तेजी से फैलता है इसलिए पीड़ित पशु को स्वस्थ पशु से अलग रखना चाहिए इस रोग से बचने का कोई प्रभाव इलाज नहीं है फिर भी संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए जीवाणु नाशक औषधियों का उपयोग किया जा सकता है इनमें एन्रोफ्लोक्सासिन नामक एंटीबायोटिक इस रोग के लिए असरकारक मानी जाती है। इसके अलावा लक्षण के आधार पर एंटीइन्फ्लेमेंट्री,एंटीपायरेटिक एवं एंटी एलर्जिक प्रयोग भी किया जा सकता है इस रोग से बचाव के लिए बकरियों को समय पर टीका लगवाना चाहिए। 

2  बकरियों में चेचक :यह रोग  बकरी में काफी तेजी से फैलता है इस रोग से पीड़ित पशु को बुखार आता है और त्वचा पर दाने निकलने लगते हैं यह भी रोग ग्रस्त पशुओ  से दूसरे स्वस्थ पशुओ के संपर्क में आने से होता है रोग ग्रस्त पशु को एक ही जगह चारा, खाना दूषित रोग ग्रसित  हो चुके पशु को  गोबर और मूत्र से भी संक्रमण स्वस्थ पशु  में पहुंचता है इसके अलावा पशुपालक  के हाथों से भी रोग  का संचरण होता है इसका भी कोई प्रभाव उपचार नहीं मिला है । लेकिन संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए जीवाणु नाशक औषधियों व मलहमों का फफोलो पर प्रयोग करना चाहिए  इसके लिए टिंचर आयोडीन का प्रयोग किया जा सकता है। 

  3 खुरपका व मुंह पका रोग :यह भी विषाणु जनित रोग है यह भी अधिकांश गाय ,भैंस ,बकरी , सूअर  में पाया जाता है इस रोग के प्रकोप की संभावना बसंत में वर्षा ऋतु में अधिक होती है इसमें पीड़ित बच्चों को तेज बुखार आता है और पशु के मुंह, थन, व खुरों के बीच व निचली सतह पर छाले, लंगड़ापन, लगातार  अत्यधिक मात्रा में लार का टपकना, गर्भ का गिर जाना, दुधारू पशुओं में दूध उत्पादन में गिरावट व पशु को जुगाली करने में परेशानी आना इस रोग प्रमुख लक्षण हैं इस रोग से ग्रसित पशुओं को पहले  स्वस्थ पशुओं से अलग कर दें रोगी पशु के खुरो और  मुंह के छालों को एंटीसेप्टिक लोशन जैसे पोटाश, फिटकरी, बोरिक एसिड में नमक को पानी में डालकर धोना चाहिए रोग से बचाव के लिए पशु को टीका लगवाना चाहिए। 
बकरियों को रोग सुरक्षा के लिए जो टीके लगाए जाते हैं उनके नाम इस प्रकार से हैं-

पी. पी. आर 
एफएमडी 
चेचक 
टिटनेस 
ब्लैक क्वार्टर 
एंटेरोटोक्सिमिया