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जब मराठवाड़ा किसानो ने परम्परागत खेती को छोड़ की ये खेती तो होने लगी लाखो की कमाई
 

क्या आपने ऐसे  किसानों की कल्पना की है जो अपने खेतों में पारंपरिक फसलों की खेती छोड़कर फलो को उगाना  शुरू कर दे और उनकी आमदनी कई गुना बढ़ जाए ऐसे किसान की कल्पना कीजिए जो इतना कमा ले इतना महानगरों की कारपोरेट दुनिया के बॉस। 

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6 साल में बीच में 2 साल की भयानक महामारी के बावजूद उन्होंने अपनी कल्पना को हकीकत में बदल दिया 

ऐसे किसान जो आत्महत्या के बारे में सोचना छोड़ कर हंसते ,खेलते ,स्वस्थ और खुशहाल जीवन के स्वामी बन जाए। 2016 में अपनी एक मराठवाड़ा यात्रा के दौरान किसानों की दर्दनाक हालत देखकर भी आम आदमी के पार्टी के प्रमुख नेता रहे मयंक गांधी ने ऐसी ही कल्पना की थी। 6 साल में बीच में 2 साल की भयानक महामारी के बावजूद उन्होंने अपनी कल्पना को हकीकत में बदल दिया। अभी हाल ही में मुंबई से करीब 50 लोगों की टीम को मराठवाड़ा किसानों से मिलवाने ले गए ,बिना समय गवाएं वहां से कारों में सवार होकर 110 किलोमीटर दूर रूई   गांव की ओर गए। वहां पर रूई  गांव के सरपंच कालिदास नावली जिन्होंने गांव में रेशम की खेती शुरू करवाई । 

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सरपंच से 37 साल के कालिदास को मयंक गांधी के आश्वासन के बीच विचार आया कि शहतूत लगाया जाए और रेशम पैदा किया जाए

 महज 4 साल में भी गांव में भुखमरी की कगार से उठकर समृद्ध बन गया। 4 साल पहले तक 6000 की जनसंख्या वाले गांव पानी की कमी के बीच गेहूं  और कपास की खेती करता था और घोर गरीबी में जी रहा था। तब गांव के सरपंच से 37 साल के कालिदास को मयंक गांधी के आश्वासन के बीच विचार आया कि शहतूत लगाया जाए और रेशम पैदा किया जाए  4 साल में ही गांव का रूपांतरण हो गया। 

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 पहले रोजी-रोटी की तलाश में गांव से 300 लोग बाहर जाते थे अब रोजगार की तलाश में बाहर से 300 लोग ही गांव आते हैं। गांव के महीने की सम्मिलित आमदनी ढाई करोड रुपए छूने लगी। यह सब क्रांतिकारी था ,रुई गांव की काया कलप   देखकर हर कोई हैरान था वहां से 90 किलोमीटर दूर कर नानी गांव के किसान रामेश्वर कदम केले का फार्म है पहले यहां कॉटन की खेती होती थी जिसमें साल में ₹45000 की पैदावार होती थी अभी  केले होते हैं जिनमें लगभग ₹360000 तक की सालाना कमाई होती है कमाई में लगभग 8 गुना इजाफा है।ऐसे ही कई किसान है जो परम्परागत खेती को छोड़कर अलग खेती कर रहे है और लाखो की कमाई कर रहे है।