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गेहू की ये किस्म कहलाती है सोने की खेती ,बिकती है इतनी महंगी ,यहां जाने इसके बौने की पूरी जानकारी

 

खेती किसानी को ज्यादा लाभकारी बनाने के लिए किसानों के साथ-साथ वैज्ञानिक  नए -नए  तरीके ईजाद कर रहे हैं इससे खेती की लागत को कम करके अधिक उत्पादन प्राप्त हो सके और किसानों को भी अच्छा मुनाफा मिल सके।  देश में सर्वाधिक उगाई जाने वाली गेहूं की नई किस्में भी बेहतर उत्पादन कर किसानों का अच्छा मुनाफा देने का मौका दे रही है।  इनमें गेहूं की किस्मों में लोकप्रिय काठिया प्रजाति जिसे काला गेहूं भी कहते हैं ,शामिल है ,इस लोकप्रिय  काठिया किस्म के  गेहूं से  दलिया ,सूजी और रवा के साथ-साथ सेवइयां नू,डल्स ,पिज्जा वर्मीकल बनाई जा रही है। कठिया गेहूं की फसल पानी की कमी वाले इलाकों में किसी वरदान से कम नहीं है। 

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कम पानी वाले इलाकों में भी काठिया गेहूं की खेती करके 30 से 35 क्विंटल तक उत्पादन कर सकते हैं

भारत में करीब 2500000 हेक्टेयर क्षेत्र में काठिया गेहूं की खेती का अधिक उत्पादन हो रहा है गेहूं के उत्पादन की बढ़ती डिमांड के चलते कठिया गेहूं का रकबा बढ़ाने की जरूरत है। पोषक तत्वों से भरपूर गेहूं की प्रजाति कुछ साल पहले तक केवल उत्तर प्रदेश के किसानों तक ही सीमित थी लेकिन अब इसकी खूबियों को देखते हुए गुजरात, राजस्थान के किसान भी काठिया  गेहूं की खेती करने लगे है असिंचित या कम पानी वाले इलाकों में भी काठिया गेहूं की खेती करके 30 से 35 क्विंटल तक उत्पादन कर सकते हैं।

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बाकी किस्मों के अलावा  1.5 से 2  % अधिक प्रोटीन मौजूद होता है

वहीं सिंचित इलाकों में काला गेहूं 50 से 60 क्विंटल की पैदावार देता है।  गेहूं की साधारण किस्मों की तुलना में काठिया  गेहूं को beta-carotene व ग्लूटेन का अच्छा स्रोत मानते हैं इसे बाकी किस्मों के अलावा  1.5 से 2  % अधिक प्रोटीन मौजूद होता है। पोषक तत्वों से भरपूर काठिया गेहूं की फसल में रतुआ रोग की संभावना कम ही रहती है देश - विदेश में बढ़ती मांग की वजह से यह गेहूं 4000 से ₹6000 प्रति क्विंटल की भाव में बाजार में बिक रहा है ऐसी दशा में काठिया गेहूं की बुवाई अक्टूबर महीने के अंतिम सप्ताह के नवंबर से प्रथम सप्ताह तक अवश्य कर देनी चाहिए और सिंचित अवस्था के नवंबर का दूसरा तीसरा सप्ताह सर्वोत्तम समय होता है। काठिया  गेहूं की किस्मों में सूखा प्रतिरोधी क्षमता अधिक होती है इसलिए 3 सिंचाई ही  पर्याप्त होती है इसमें45-50 कु०/हे० पैदावार हो जाती है।