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बंजर भूमि पर वन विभाग ने अर्जुन और आसान के पौधे ,12 से अधिक गाँवों के लोग ऐसे इनसे भर रहे है पेट
 

झारखंड सीमा से लगा श्याम बाजार के आसपास का सुदूर बंजर जमीन का इलाका  जहां वन विभाग के प्रयास से करीब 100 एकड़ के क्षेत्र में वन संपदा को विकसित किया गया है।  अब इन  अन्य क्षेत्र के आसपास के अल्पसंख्यक और आदिवासी बहुल समुदाय के दर्जन भर गांवों के लोगों में अपनी मेहनत और लगन के दम पर रोजगार का रास्ता निकाल लिया है । 

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अर्जुन और आसन वन के  इस पौधे वाले जंगलों में स्थित पेड़ों की टहनियों पर कोकून  उत्पादन कर अपनी तकदीर बदल दी है

इसके जरिए दो वक्त की रोटी के मुताज लोग  आत्मनिर्भर हो चुके हैं। अर्जुन और आसन वन के  इस पौधे वाले जंगलों में स्थित पेड़ों की टहनियों पर कोकून  उत्पादन कर अपनी तकदीर बदल दी है। इस कार्य में लगे आस-पास के गांव काठी कुंद, सांगा, विरनिया, धोवरना, लेटावा बरन, भोड़सार, झिकटिया सहित अन्य गांव के किसान मोहम्मद यूनुस, मोहम्मद नईम, मोहम्मद यूसुफ, दरबारी, श्यामलाल टूडू, गुलाम, मनु सोरेन सहित अन्य लोगों ने कहा कि पिछले 20 वर्षों से वह लोग इस धंधे में लगे हुए हैं। 

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अंडों को ₹ 2500 रुपए प्रति पैकेट खरीदारी कर इससे 20 से 25 हजार तक का मुनाफा कमाया जा सकता है

बरसात के बाद ही धंधे में हर साल  शुरुआत करते हैं उड़ीसा से प्राप्त अंडे  को यह  लोग कोकून  उत्पादन के लिए उपयोग में लाते है। उसके बाद यह अंडा चार-पांच दिन बाद ग्रीन कीड़े में बदल जाता है। अर्जुन के पौधे पर आश्रय बनाते हैं ,उड़ीसा से मंगाए गए अंडों को ₹ 2500 रुपए प्रति पैकेट खरीदारी कर इससे 20 से 25 हजार तक का मुनाफा कमाया जा सकता है।  कोकून  5 से ₹12 प्रति पीस बेची जाती है जो लोग सहपरिवार 20 साल से रोजगार में है। इस काम में लगे लोगों का कहना है कि अगर सरकारी अनुदान और बिक्री बाजार का अनुदान  और अन्य किसानों के लिए प्रेरणा साबित हो सकता है। कोकून की खेती में में सबसे बड़ी चिंता इस बात की है कि वैश्विक मंदी के कारण 2 साल धंधा पानी ठप था  वहीं, अगर प्रदूषित और संक्रमित अंडा तथा मौसम के परिवर्तन के कारण कीड़ा मरा तो एक कीड़ा के कारण अन्य कीड़े भी इससे इंफेक्शन होकर मर जाते हैं, तब जो किसान क्षेत्रीय करदाताओं से ऋण लेकर इस धंधा को जो शुरू करता है। उन पर रिस्क हो जाता है कि अगर सभी कीड़े मर गए तो ऋण कहां से चुकाएंगे।