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कैसे किया पितरो का पिंड दान और करते समय किन सावधानियों को ध्यान रखना जरूरी ,यहां जाने
 

पितृपक्ष में हमारे पूर्वज धरती पर आते हैं और अपनी संतानों को आशीर्वाद देते हैं पितृपक्ष ऐसा समय है जो पूर्वज हमें बीच में नहीं है उनके प्रति सम्मान का समय होता है इस बार पितृपक्ष भाद्रपद शुक्ल पक्ष 10 सितंबर से शुरू हो गए हैं जो अमावस्या पर 25 सितंबर तक समाप्त होंगे पृथ्वी लोक पर अपने सगे संबंधी और परिवार के लोगों से अपनी मुक्ति और भोजन के लिए पितृ धरती पर आते हैं। 

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 ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार सबसे बड़ा पुत्र अपने पिता और अन्य पूर्वजों का श्राद्ध तर्पण कर सकता है पितृपक्ष में श्राद्ध कर्म के रूप में तर्पण ,पिंडदान और ब्राह्मण भोज यह तीन मुख्य कार्य किए जाते हैं दक्षिण दिशा की ओर मुख करके आचमन करें जनेऊ को दाएं कंधे पर रखकर गाय का दूध ,चावल, शक्कर,शहद और घी को मिलाकर  पिंडो का निर्माण  करें और उन्हें श्रद्धा भाव के साथ अपने पितरों को अर्पित करें यही पिंड -दान करना कहलाता है इसके बाद भोजन करवाना चाहि। 

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एइन 16 दिनों के दौरान अगर कोई अनजान व्यक्ति आपसे मिलने आता है तो इस व्यक्ति को बिना खाना खिलाए घर ना भेजें इस दौरान एक थाली में कौवा ,एक गाय, कुत्ता और दूसरी थाली में पितरों के निमित्त भोजन रखें पितृपक्ष में कभी भी अपने घर में से किसी को भी बिना पानी पिए ना जाने दे यदि कोई पानी मांग रहा है तो उस पानी के साथ मीठा भी दे पित्र पक्ष में बिल्कुल सादा खाना खाए मांसाहारी या तामसिक भोजन से दूर रहें शराब और नशीली चीजों से भी दूर रहे घर में कलह  ना होने दें .

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पितृपक्ष में वेला  स्नान करके पितरों को याद करना चाहिए  कुतुप वेला यानि  की  सुबह 11:30 से 12:30 बीच का समय इस समय पर में पितरों को तर्पण दे इस बेला में तर्पण का विशेष महत्व है तर्पण  में कुश और काले तिल का विशेष महत्व होता है कुछ और काले तिल के साथ तर्पण करना अच्छे परिणाम देने वाला होता है।