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श्राद्ध में ब्राह्मण को खिलाया गया भोजन कैसे पहुंचता है पित्तरो के पास ,पुराणों में है ये मान्यता
 

पितृपक्ष के दौरान पितरों को तर्पण के साथ ही उनके प्रति श्रद्धा अर्पण के इस पक्ष का हिंदू शास्त्रों में भी काफी महत्व है क्योंकि यह वह समय है जब श्राद्ध कर्म करके हमारे पूर्वजों को संतुष्ट करते हैं और उनका आशीर्वाद और संतुष्टि प्राप्त करते हैं जब भी हम श्राद्ध कर्म करते हैं तो ज्यादा लोगों के मन में यह सवाल आता है कि शास्त्रों के अनुसार हर व्यक्ति अपने कर्म के अनुसार अलग-अलग योनियों में जन्म लेता है दूसरे  आदमी कराया गया भोजन उन तक कैसे पहुंचता है ऐसे में आज हम आपको शास्त्रों में प्रचलित मान्यताओं के बाद आधार पर कुछ बातें बताते हैं। 

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 गरुड़ पुराण सहित कई स्मृतियों में इस सवाल का जवाब मिलता है कि पितरों को दिया गया भोजन  या पिंड उनकी नई योनियों तक  कैसे और किस मात्रा में पहुंचता है इस संबंध में शास्त्र अलग अलग ईश्वरीय विधान की बात कहते हैं  शास्त्रों के अनुसार योनियों के अनुसार पहुंचाने की व्यवस्था के अधिपति पितरों आदि के अधिष्ठाता अग्निष्वात्त आदि है गोत्र और नाम के साथ जो भी भोजन  और  पानी पितरों को दिया जाता है वह उनकी वर्तमान योनि में आवश्यकता के अनुसार उन्हें अपने आप मिल जाता है ठीक वैसे ही जैसे वर्तमान युग में  एक देश से  दूसरे देश में यात्रा करने वाले मनुष्य की करंसी  उस देश के हिसाब से बदल जाती है। 

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यदि किसी मनुष्य के पूर्वज देव बन गए हैं तो श्राद्ध का भोजन उन्हें अपने आप अमृत के रूप में मिलता है गंधर्व बने हैं तो अलग-अलग  भोगो  के रूप में प्राप्त होता है वहीं अगर पशु बन गए हैं तो घास के रूप में ,नाग योनियों में जन्म लेते हैं तो अनुयायियों के रूप में ,राक्षस दानव बनने पर आमिष यानी मांस के रूप में और मनुष्य बनने पर अलग-अलग भोग पदार्थ के रूप में वे उस योनि को प्राप्त हो जाते हैं हेमंत ऋतु क्रम पुराण के अनुसार देव लोक परलोक में पहुंचे पूर्वज श्राद्ध करते समय मंत्रोच्चारण से भी श्राद्ध स्थल पर पहुंचकर भोजन ग्रहण करते हैं सूक्ष्म रूप में देव पितर लोग से श्राद्ध लोक पर पहुंचकर ब्राह्मण के शरीर से सटकर भोजन प्राप्त कर तृप्त होते हैं पुराण के अनुसार  पित्तर कर्म वंश अंतरिक्ष में मन की गति से चलने वाले सूक्ष्म वायवीय शरीर में होते हैं  जो स्मरण करते ही श्राद्ध देश में आ जाते है ।