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ज्येष्ठ अमावस्या के साथ 19 मई को पड़ रहे है वट सावित्री और शनि जयंती ,यहां जाने इनके बारे में

 

19 मई को ज्येष्ठ  अमावस्या  शनि जयंती और वट सावित्री व्रत है। इस दिन के की पूजा पाठ से घर-परिवार में सुख-समृद्धि बनाती हुई है वैवाहिक जीवन में आपसी प्रेम बढ़ता है।  ज्येष्ठ अमावस्या पर शनिदेव  ,वट सावित्री रखे और पितरो  के लिए योगदान करें। ज्योतिष के अनुसार ज्येष्ठ अमावस्या पर  शनिदेव का जन्म हुआ था। सनी सूर्य के पुत्र  है पुराने समय में इस तिथि पर सावित्री  अपने पति सत्यवान के प्राण की रक्षा की थी। 

शनि देव से जुड़ी खास बातें

सूर्य देव का विवाह प्रजापति दक्ष की पुत्री संज्ञा से हुआ था इनकी तीन संतान  हुई थी। मनु ,यम और यमुना। संज्ञा सूर्य के तेज को सहन नहीं कर पा रही थी। संज्ञा ने अपनी छाया को सूर्य की सेवा में लगा दिया और सूर्य को बिना बताए वहां से चली गई। कुछ समय बाद सूर्य और छाया के पुत्र के रूप में शनि देव का जन्म हुआ शनि देव श्याम वर्ण ,लम्बा  शरीर , बड़ी आंखों वाले और लंबे केश वाले हैं। 

सावित्री यमराज सत्यवान से जुड़ा है वट सावित्री व्रत 

महिलाएं वट सावित्री व्रत अपने पति के लंबे जीवन अच्छे स्वास्थ्य और सौभाग्य कामना से करते हैं। मान्यता है कि जो महिलाएं व्रत करती है उनके पति की सारी समस्याएं खत्म हो जाती है वैवाहिक जीवन सुखी होता है महिलाएं वड़ यानी  बरगद के नीचे पूजा करती है। सावित्री और सत्यवान की कथा सुनती है तथा के सुनने के अनुसार सावित्री मृत्यु के देवता यमराज को प्रसन्न करने के लिए अपने पति के प्राण वापस लिए आई थी। 

 अमावस्या पर करें पितरों के लिए धुप ध्यान 

अमावस्या पर गंगा ,यमुना ,शिप्रा , नर्मदा जैसी पवित्र नदियों में स्नान करने की परंपरा है। स्नान के बाद नदी किनारे पर ही जरूरतमंद लोगों को जूते चप्पल कपड़े अनाज और धन का दान करना चाहिए यदि  नहीं कर पा रहे हैं तो घर पर सिर्फ  तीर्थो का और  नदियों का ध्यान करते हुए  स्नान करना जिस दिन पितरों के लिए योगदान श्राद्ध कर्म करना चाहिए। दोपहर में गाय के गोबर से बने कंडे अंडे के अंगारों पर पर गुड़-घी डालें, हथेली में जल लेकर अंगूठे की ओर से पितरों को अर्पित करें। पितरों का ध्यान करें।