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Parikrama Niyam: यहां जाने कौनसे देवता की कितनी होनी चाहिए प्रदिक्षणा

 

हिंदू धर्म के देवालय ही नहीं अन्य धर्मों में अपने मुख्य भवन के चारों तरफ श्रद्धालुओं को प्रशिक्षण यानी  की परिक्रमा करते हुए देखा ही होगा मूर्तियों के चारों ओर गोलाकार आकृति में घूमने या प्रक्रिमा लगाने को ही प्रदिक्षणा   कहते हैं। प्रदक्षिणा को प्रभु की उपासना करने का माध्यम माना जाता है।  ऐसा कोई धर्म नहीं है जिसमें प्रदिक्षणा को  स्वीकारना होगा। वह हिंदू धर्म में देवी सिर्फ देवी-देवताओं की मूर्तियों को नहीं बल्कि गर्भ ग्रह। अग्नि पेड़ या यहां तक कि नर्मदा। गंगा आदि नदियों की भी परिक्रमा लगाई जाती है। क्योंकि सनातन धर्म में प्रकृति को भी साक्षात देवता के समान माना गया है। कुछ मंदिरों में तो परिक्रमा पथ भी बनाए जाते हैं।  मान्यता है कि प्रदिक्षणा हमेशा दाहिना से बाई ओर यानी घड़ी की सुई की दिशा में करनी चाहिए। इसे दक्षिणावर्त भ्रमण भी कहा जाता है। 

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हिंदू धर्म में हर देवी -देवता के लिए अलग तरह की प्रदिक्षणा का विधान है

ऐसा माना जाता है कि मूर्तियों की विराजमान होने की स्थल के आसपास गोलाकार घूमने से वहां पर बहने वाली ऊर्जा की प्राप्ति होती है। प्राण प्रतिष्ठित मूर्तियों से एक प्रकार की ऊर्जा हमेशा निकलती रहती है। धर्म शास्त्रों के अनुसार जो लोग ऐसे पवित्र स्थलों की दंडवत  प्रदिक्षणा करते हैं उनका 10 अश्वमेध यज्ञ के बराबर पुण्य की प्राप्ति होती है। हिंदू धर्म में हर देवी -देवता के लिए अलग तरह की प्रदिक्षणा का विधान आज हम आपको बताते हैं कि किस देवी देवताओं की कितनी बार प्रदिक्षणा करनी चाहिए ताकि उनका आशीर्वाद मिल सके। 

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विष्णु जी की परिक्रमा करते समय सहस्त्रनाम विष्णु जाप करने से पापों का शमन होता है

आप जब भी दुर्गा के मंदिर में जाएं तो उनकी परिक्रमा हमेशा एक बार ही करें 
सूर्य भगवान की  7 बार परिक्रमा करनी चाहिए 
गणेश जी की तीन बार परिक्रमा करनी चाहिए 
वही विष्णु भगवान की चार प्रतीक्षा करनी चाहिए ,विष्णु जी की परिक्रमा करते समय सहस्त्रनाम विष्णु जाप करने से पापों का शमन होता है शंकर जी की आधी प्रदिक्षणा करनी शास्त्रों में लिखा है कि शंकर भगवान के सोम सूत्र का उल्लंघन नहीं करना चाहिए ,सोम  सूत्र का अर्थ है कि शंकर जी को चढ़ाए जाने वाली की धारा  जहा से बहती है उसे लांगना  नहीं चाहिए। गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा को बहुत शुभ माना गया है जिन देवताओं की प्रदक्षिणा का विधान में उल्लेख नहीं है उनकी परीक्षा तीन बार करनी चाहिए।