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आखिर परिक्रमा की शुरुआत दक्षिण दिशा से ही क्यों होती है ,यहां जाने इसकी वजह
 

हिंदू धर्म में परिक्रमा करने का काफी महत्व है सनातन धर्म की महत्वपूर्ण विधि ग्रंथ ,ऋग्वेद में  प्रदक्षिणा  या परिक्रमा का जिक्र  मिलता है परिक्रमा पूजा का महत्वपूर्ण अंग माना जाता है मान्यता है कि भगवान की परिक्रमा करने से पापों का नाश होता है हिंदू धर्म में देवी देवताओं की ही नहीं पेड़ पौधों की और नदियों की भी परिक्रमा की जाती है क्योंकि सनातन धर्म में प्रकृति को भी साक्षात देव समान माना गया है आज हम आपको बताते हैं कि परिक्रमा लगाने का लाभ ,परिक्रमा करने की सही दिशा क्या है। 

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धार्मिक शास्त्र के अनुसार मंदिर में भगवान के आसपास परिक्रमा करने सकारात्मक ऊर्जा मिलती है ऊर्जा व्यक्ति को घर तक आती है  जिससे सुख-शांति बनी रहती है मंदिर में हमेशा परिक्रमा घड़ी की दिशा में ही करनी चाहिए इससे आप समझ  सकते हैं कि आपको हमेशा भगवान के दांयी तरफ से परिक्रमा शुरू करनी चाहिए  परिक्रमा के दौरान अपने इष्ट देव के मंत्र का जाप करने से उसका शुभ फल मिलता है परिक्रमा का संस्कृत शब्द प्रदक्षिणा अहइ इसे दो भागों में बांटा गया है प्रा का अर्थ है आगे बढ़ना और दक्षिणा मतलब है दक्षिण की दिशा यानी कि दक्षिण की दिशा की ओर बढ़ते हुए देवी देवता की उपासना करना। 

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परिक्रमा के दौरान प्रभु हमारे दाएं और गर्भ ग्रह में विराजमान होते हैं गणेश जी की चार, विष्णु जी की पांच ,देवी दुर्गा की एक ,सूर्य की सात ,भगवान भोलेनाथ की आधी प्रतीक्षा करनी चाहिए शिव की मात्र आधी परिक्रमा की जाती है  इसकी  मान्यता है कि जलधारी का उल्लंघन नहीं किया जाता है जलधारी तक पहुंचकर परिक्रमा को पूरा मान लिया जाता है।