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Mughal Empire: मुग़ल काल में कैसे होते थे किसान और कैसे होती थी खेती ,यहां जाने सारी बातें

 

मुगल काल में किसान कैसे थे और उनके हालात क्या थी ,क्या आपको पता है कैसे होती थी राजस्व की वसूलीमुगल काल के दौरान आमतौर पर किसानों के लिए रैयत या मुज़रियान शब्द का इस्तेमाल करते थे।  देश का किसान इन दिनों काफी चर्चा में है देश के कई क्षेत्रों में किसान अपनी मांगों को लेकर धरना दे रहे हैं लेकिन अभी तक कोई हल नहीं निकला है वैसे तो आप देखते अच्छे  भाव या फसल खराब होने के बाद मुआवजे  मांग को लेकर धरना प्रदर्शन करते हैं।  ऐसे में लगता है कि किसान हमेशा से फसल बोने से लेकर फसल बेचने तक का संघर्ष करता है।  यह हालात तो अभी के हैं लेकिन कभी आपने सोचा है क्या कि प्राचीन भारत में किसानों के से काम करते थे।  हम बात कर रहे हैं करीब सोलहवीं और सत्रहवीं  शताब्दी की जब भारत में मुगल साम्राज्य था उस वक्त भारत के 80 फीसदी से ज्यादा लोग गांव में रहते थे और राजस्व वसूलने की खेती सबसे बड़ा जरिया था। ऐसे में हम समझते हैं कि उस समय हमारा कृषि जगत कैसे काम करता था ,किसानों के हालात कैसे थे और किसान किस तरह से उत्पादन करते हैं ,मुगल काल के दौरान आमतौर पर किसानों के लिए 'मुज़रियान ' शब्द का इस्तेमाल होता था। इस दौरान किसानों के लिए 'किसान' या 'आसामी '  में शब्द का इस्तेमाल होने की भी प्रमाण मिले हैं। 17 वी किसानों शताब्दी के अनुसार उस वक्त दो तरह की किसान होते थे इसमें खुद-काश्त और पाहि-काश्त ,खुद काश्त वो थे जिनकी जमीन होती थी और अपनी ही जमीन गांव में खेती करते थे बल्कि पाहि-काश्त -वो थे किसान होते से दूसरे गांव से खेती करने के लिए किसी ठेके पर आते थे उस दौरान भी कई ऐसे होते थे जिनके पास काफी जमीन और संसाधन होते थे।

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फसलों को ‘जिन्स-ए-कामिल’ कहा जाता था

माना जाता था कि उस दौरान भारत के उन किसानों के पास एक जोड़ी बैल से ज्यादा कुछ नहीं होता था। वहीं गुजरात के पीछे किसानों के पास कई एकड़ जमीन होती थी बंगाल में भी एक किसान की औसत जमीन थी और उस दौरान जिस किसान के पास 10 एकड़ जमीन होती थी वह खुद को अमीर मानते थे इस दौरान सामान भी हर किसान के पास अलग-अलग होते थे। वहीं, अगर फसलों की बात करें तो उस दौरान आगरा में 39 किस्म की फसलें, दिल्ली में 43 किस्म की फसलों की पैदावार होती थी. वहीं, बंगाल में सिर्फ 50 किस्में ही पैदा होती थीं. कई फसलें ऐसी भी होती थीं, जिनका मूल्य काफी अधिक होता था और उन फसलों को ‘जिन्स-ए-कामिल’ कहा जाता था. फिर कई फसलें विदेशों से आईं, जिसमें मक्का, टमाटर, आलू, पपीता आदि शामिल है। उस दौरान किसी व्यवस्था में जाति व्यवस्था काफी  होती होती थी  इस जातिगत व्यवस्था की वजह से किसानों के कई वर्ग बँटे हुए थे। हर जाति के हिसाब से पंचायतें होती थी यहां ताकि राजस्व फसल की बिक्री में जातिगत व्यवस्था को  व्यापार किया जाता था वही जमीदार इस कृषि व्यवस्था का अहम हिस्सा होते थे उस वक्त जमीन से मिलने वाला राजस्व ही मुगल साम्राज्य की आर्थिक बुनियाद था इस दौरान कितना तय करते हो कितने की वसूली के आधार पर किया जाता था इसे जमा और हासिल कहा जाता था। 

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पोलज’जमीन पर ज्यादा करना देना होता था क्योंकि जमीन पर 12 महीने फसल होती थी वही ‘परौती’ जमीन पर कम क्योंकि कुछ समय के लिए ही फसल होती थी

अकबर के किसानों के सामने नगद कर या फसलों के रूप में कर देने का ऑप्शन भी रखा था। साथ ही अकबर के शासन काल में हर जमीन पर एक जैसी व्यवस्था नहीं थी जबकि अलग अलग तरीके से वसूली होती थी जैसे पोलज’जमीन पर ज्यादा करना देना होता था क्योंकि जमीन पर 12 महीने फसल होती थी वही ‘परौती’ जमीन पर कम क्योंकि कुछ समय के लिए ही फसल होती थी वहीं बंजर जमीन के लिए अलग व्यवस्था थी यहां तक कि फसल की किस्म के आधार पर किसानों से  कर लिया जाता था।  करीब एक तिहाई हिस्सा शाही शुल्क के रूप में जमा किया जाता था। इस दौरान भी किसानों के हित का काफी ध्यान रखा जाता था। दरअसल 1665 ईस्वी में राजस्व अधिकारी को औरंगजेब ने हुक्म दिया था इसमें कहा गया था कि वह परगनाओं के अमीनों को निर्देश दिए कि वे हर गांव हर किसान की बाबत खेती के मौजूदा हालात पर करें और बारीकी से उनकी जांच करने के बाद सरकार की वित्तीय हितों व किसानों के कल्याण को ध्यान में रखते हुए जमा निर्धारित करें।