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महाराणा प्रताप ने हल्दीगाहटी युद्ध के बाद ली थी अपनी कुलदेवी की शरण ,यहां जाने कहाँ है वो मंदिर

 

भारतीय इतिहास में वीरता के लिए प्रसिद्ध अमर नायक थे महाराणा प्रताप। राजस्थान के कुंभलगढ़ में महाराणा प्रताप का जन्म हुआ था  वह सिसोदिया राजवंश के महाराणा उदय सिंह एवं माता रानी जीवंत  कंवर की पुत्र थे। ममहाराणा प्रताप की मां जीवत कंवर पाली के सोनगरा राजपूत अखैराज की पुत्री थीं। प्रताप का बचपन का नाम 'कीका' था। मेवाड़ के राणा उदयसिंह की 33  संताने थी उनमें से प्रताप सिंह सबसे बड़े थे। सर्वसाधारण शिक्षा लेने से खेलकूद एवं हथियार बनाने की कला सीखने में उनकी रुचि अधिक थी और बचपन से ही काफी महाराणा प्रताप बड़ा होने पर महापुरष बनेगे ये सभी को पता था। सर्वसाधारण शिक्षा लेने को खेलकूद एवं हथियार बनाने की कला सीखने में उनकी रूचि अधिक थी। 

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इतिहास में उल्लेख मिलता है कि वर्ष 1576 में हल्दीघाटी के युद्ध के बाद मेवाड़ शासक इतिहास पुरुष महाराणा प्रताप ने विपत्ति के दिनों में सुंधा माता की शरण ली थी सुंधा माता महाराणा प्रताप की कुलदेवी है। सुंधा माता मंदिर जिला मुख्यालय से करीब 105 किलोमीटर एवं भीनमाल से 35 किलोमीटर दूर रानीवाड़ा तहसील के गांव के पास एक ऐतिहासिक एवं प्राचीन तीर्थ स्थल है। अरावली पर्वतमाला के इस  पहाड़ का नाम सुंधा होने की वजह से इस देवी को सुंधा माता के नाम से जाना जाता है। माता की प्रतिमा बिना धड़ के होने की विशेष इसे अधदेश्वरी भी कहा जाता है। सुंधा माता मंदिर राजस्थान का वही स्थान है जहां देवी देवताओं की खंडित मूर्ति को इस स्थान पर रखे जाते हैं सुंधा पर्वत का पौराणिक एवं ऐतिहासिक दृष्टि से भी कम महत्व नहीं है। तिरुपुर राक्षस का वध करने के लिए आदि देव की तपोभूमि यही मानी जाती है।

इसके अलावा चामुंडा माता की मूर्ति के पास एक शिवलिंग विस्थापित है कहा जाता है कि 1576 में हल्दीघाटी युद्ध के बाद महाराणा प्रताप ने अपने कष्ट के दिनों में सुंधा माता की शरण ली थी। मां सुंधा माता को मां चामुंडा के नाम से भी जाना जाता है यह मंदिर आज बड़े  पर्यटन स्थल के रूप में जाना जाता है जालौर की सुंधा पहाड़ियों में स्थित मां सुंधा माता का मंदिर 1200 मीटर से अधिक ऊंचाई पर स्थित है।  कहते हैं कि इस मां चामुंडा के इस मंदिर से श्रद्धालु कभी खाली हाथ और निराश नहीं लूटते हैं।  मां चामुंडा का यह देव मंदिर 900 साल से भी ज्यादा पुराना माना जाता है। यह मंदिर हिल स्टेशन माउंट आबू से 64 किलोमीटर और भीनमाल से 20 किलोमीटर दूर है।

यह मंदिर अरावली की पहाड़ियों में स्थित है उसकी सुंदरता देखते ही बनती है। इसके चारों तरफ कल -कल करते झरने मंदिर की सुंदरता में चार चांद लगाते हैं। गुजरात के  इस  मंदिर में दर्शन के लिए आते हैं कहा जाता है कि जालौर के चौहान शासकों को सुंधा माता के प्रति विशेष आदर भाव रहा है।  इसी के कारण उदयसिंह के पुत्र  चाचिगदेव ने इस मंदिर का निर्माण संवत 1312 में करवाया था। 1319 में अक्षय तृतीया के दिन विधि विधान से मां चामुंडा की प्रतिष्ठा करवाई गई थी इस मंदिर को लेकर मान्यता है कि सुंधा माता के दर्शन के लिए आने वाले श्रद्धालु अपने साथ खंडित मूर्तियां साथ लाते हैं और उनको पहाड़ पर छोड़ कर चले जाते हैं। 

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 प्रताप का बचपन का नाम 'कीका' था 

भारतीय इतिहास में वीरता के लिए प्रसिद्ध अमर नायक थे महाराणा प्रताप। राजस्थान के कुंभलगढ़ में महाराणा प्रताप का जन्म हुआ था  वह सिसोदिया राजवंश के महाराणा उदय सिंह एवं माता रानी जीवंत  कंवर की पुत्र थे। ममहाराणा प्रताप की मां जीवत कंवर पाली के सोनगरा राजपूत अखैराज की पुत्री थीं। प्रताप का बचपन का नाम 'कीका' था। मेवाड़ के राणा उदयसिंह की 33  संताने थी उनमें से प्रताप सिंह सबसे बड़े थे। सर्वसाधारण शिक्षा लेने से खेलकूद एवं हथियार बनाने की कला सीखने में उनकी रुचि अधिक थी और बचपन से ही काफी महाराणा प्रताप बड़ा होने पर महापुरष बनेगे ये सभी को पता था। सर्वसाधारण शिक्षा लेने को खेलकूद एवं हथियार बनाने की कला सीखने में उनकी रूचि अधिक थी। 

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माता की प्रतिमा बिना धड़ के होने की विशेष इसे अधदेश्वरी भी कहा जाता है 

इतिहास में उल्लेख मिलता है कि वर्ष 1576 में हल्दीघाटी के युद्ध के बाद मेवाड़ शासक इतिहास पुरुष महाराणा प्रताप ने विपत्ति के दिनों में सुंधा माता की शरण ली थी सुंधा माता महाराणा प्रताप की कुलदेवी है। सुंधा माता मंदिर जिला मुख्यालय से करीब 105 किलोमीटर एवं भीनमाल से 35 किलोमीटर दूर रानीवाड़ा तहसील के गांव के पास एक ऐतिहासिक एवं प्राचीन तीर्थ स्थल है। अरावली पर्वतमाला के इस  पहाड़ का नाम सुंधा होने की वजह से इस देवी को सुंधा माता के नाम से जाना जाता है। माता की प्रतिमा बिना धड़ के होने की विशेष इसे अधदेश्वरी भी कहा जाता है। सुंधा माता मंदिर राजस्थान का वही स्थान है जहां देवी देवताओं की खंडित मूर्ति को इस स्थान पर रखे जाते हैं सुंधा पर्वत का पौराणिक एवं ऐतिहासिक दृष्टि से भी कम महत्व नहीं है। तिरुपुर राक्षस का वध करने के लिए आदि देव की तपोभूमि यही मानी जाती है। इसके अलावा चामुंडा माता की मूर्ति के पास एक शिवलिंग विस्थापित है कहा जाता है कि 1576 में हल्दीघाटी युद्ध के बाद महाराणा प्रताप ने अपने कष्ट के दिनों में सुंधा माता की शरण ली थी। 

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 मां चामुंडा का यह देव मंदिर 900 साल से भी ज्यादा पुराना माना जाता है 

 मां सुंधा माता को मां चामुंडा के नाम से भी जाना जाता है यह मंदिर आज बड़े  पर्यटन स्थल के रूप में जाना जाता है जालौर की सुंधा पहाड़ियों में स्थित मां सुंधा माता का मंदिर 1200 मीटर से अधिक ऊंचाई पर स्थित है।  कहते हैं कि इस मां चामुंडा के इस मंदिर से श्रद्धालु कभी खाली हाथ और निराश नहीं लूटते हैं।  मां चामुंडा का यह देव मंदिर 900 साल से भी ज्यादा पुराना माना जाता है। यह मंदिर हिल स्टेशन माउंट आबू से 64 किलोमीटर और भीनमाल से 20 किलोमीटर दूर है। यह मंदिर अरावली की पहाड़ियों में स्थित है उसकी सुंदरता देखते ही बनती है। इसके चारों तरफ कल -कल करते झरने मंदिर की सुंदरता में चार चांद लगाते हैं। गुजरात के  इस  मंदिर में दर्शन के लिए आते हैं कहा जाता है कि जालौर के चौहान शासकों को सुंधा माता के प्रति विशेष आदर भाव रहा है।  इसी के कारण उदयसिंह के पुत्र  चाचिगदेव ने इस मंदिर का निर्माण संवत 1312 में करवाया था। 1319 में अक्षय तृतीया के दिन विधि विधान से मां चामुंडा की प्रतिष्ठा करवाई गई थी इस मंदिर को लेकर मान्यता है कि सुंधा माता के दर्शन के लिए आने वाले श्रद्धालु अपने साथ खंडित मूर्तियां साथ लाते हैं और उनको पहाड़ पर छोड़ कर चले जाते हैं।