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वैज्ञानिको ने 12 साल तक ब्रेन की रिसर्च कर इस इंसान को बताया दुनिया सबसे खुश हाल व्यक्ति , यहां जाने इसका कारन

 

अक्सर कहा जाता है कि पैसों से खुशियां खरीदी नहीं जा सकती लेकिन एक नए रिसर्च से पता चला है कि यह सोच सही नहीं है। हाल ही में नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री काह्नमैन ने 33 से ज्यादा अमेरिकी वयस्कों  पर शोध के बाद अपने उसी बात से पलट गई। इसमें उन्होंने कहा था कि पैसों से खरीदी जा सकती है। लेकिन हमें एक ऐसे शख्स की बात करने जा रहे हैं जिनकी दिमाग पर 12 साल की सर्च कर के वैज्ञानिकों ने दुनिया का सबसे खुश इंसान बताया है।  हम बात  कर रहे है  बौद्ध भिक्षु मैथ्यू रिचर्ड की। 

उनके दिमाग पर 256 सेंसर  लगाकर वजन जानने की कोशिश की

फ़्रांस में 1946 में जन्मे मैथ्यू रिचर्ड  खुशी की तलाश में तिब्बत आ गए थे जहां वे दलाई लामा की फ्रेंच ट्रांसलेटर का काम करते थे। ट्रांसलेटर के साथ-साथ मेडिटेशन भी करना शुरू कर दिया जिसकी वजह से उन्हें अपार खुशियों का एहसास होने लगा और वह हरदम खुश रहने लगे। विस्कॉन्सिन  यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक ने उनके दिमाग पर 256 सेंसर  लगाकर वजन जानने की कोशिश की। फिर बाद में वैज्ञानिकों ने उन्हें दुनिया के सबसे खुशहाल घोषित किया। जांच में यह पता चला कि ध्यान करते हैं तो उनके दिमाग से गामा किरणे  निकलती है और याददाश्त बढ़ाने में मदद करती है। रिचर्ड ने अपने किताब में भी 'ध्यान' को ख़ुशी की वजह बताया है।  मैथ्यू रिचर्ड  का जन्म फ्रांस के सुदूर गांव में हुआ था।इनके  माता-पिता फिलोसोफी पढ़ाते थे। मैथ्यू  बाकी बच्चों की तरह सामान्य स्कूल कॉलेज गए और मॉलिक्यूलर जेनेटिक्स  में पीएचडी की है। उनकी ये  सबसे बड़ी डिग्री थी इसी डिग्री की बदौलत उस दौर में भी वह कहीं भी नौकरी हासिल करते थे लेकिन फिर भी वे ना खुश रहने लगे थे। 

ये ध्यान और याददाश्त को बढ़ाने में मदद करती हैं

कुछ वर्षों बाद फ़्रांस  छोड़कर तिब्बत पहुंच गए जहां वे  दलाई लामा की फ्रेंच ट्रांसलेटर के रूप में  करने लगे। इसके साथ-साथ में मेडिटेशन भी करने लगे और बौद्ध धर्म से जुड़े बाकी चीजें सीखते थे समय चलता गया धीरे-धीरे मैथ्यू की तलाश खत्म खत्म होती गई और खुश रहने लगे  यहां तक कि उनके करीब आने वाला हर शख्स भी खुश रहने लगा।मैथ्यू खुद मानने लगे उन्हें हरदम खुश रहने का तरीका चुका है। कोई भी बदलावउन्हें  उदास नहीं करता। मैथ्यू  ने बताया कि मेडिटेशन से उन्हें यादास्त बढ़ाने के साथ-साथ खुश रहने में भी मदद मिलती है। . मालूम हो कि मैथ्यू न केवल बौद्ध भिक्षु है उसके साथ साथ वे एक स्किल्ड फोटोग्राफर, लेखक और वैज्ञानिक भी हैं उनकी हमेशा खुश रहने की आदत ने वैज्ञानिकों गलियारे को उसके कारण पर सोचने पर मजबूर कर दिया तब विस्कॉन्सिन यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने इस बार जांच की ठानी। वहां के न्यूरोलॉजिस्ट उनके स्कल पर  256 सेंसर लगा दिए जिसके भीतर हो रही हर एक हलचल का पता चल लग सके। ये रिसर्च 12 सालों तक चली. इसमें दिखा कि जब भी मॉन्क ध्यान करते, उनका मस्तिष्क गामा विकिरणें पैदा करता था।ये ध्यान और याददाश्त को बढ़ाने में मदद करती हैं। 

 आखिरकार वैज्ञानिकों ने मान लिया कि मैथ्यू के भीतर नेगेटिविटी के लिए कोई जगह नहीं है

रिसर्च में वैज्ञानिकों ने पाया कि उनके ब्रेन का बायां हिस्सा काफी सक्रिय था, जिसे प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स कहते हैं, दाहिने भाग से काफी ज्यादा एक्टिव था ।  ये हिस्सा क्रिएटिविटी से तो जुड़ा ही है, साथ ही खुशी से भी जुड़ा है।  साइंटिस्ट्स के दल ने ऐसा कभी नहीं दिखा था।  आखिरकार वैज्ञानिकों ने मान लिया कि मैथ्यू के भीतर नेगेटिविटी के लिए कोई जगह नहीं है।