Movie prime
Gujarat Election 2022 :गुजरात में नेताओ को छोड़कर किसी को नहीं है इंट्रेस्ट ,आखिर जनता क्यों नहीं इस चुनाव में इंट्रेस्ट ,यहां जाने
 

गुजरात चुनाव में इस बार सिर्फ नेता बोल रहे हैं जनता खामोश है ज्यादातर जगह तो जनसभाओं में पहले जैसी रौनक नहीं है। कुल मिलाकर लोगों में पहले की तरह चुनाव के प्रति उत्साह तो नहीं है। गांव में तो फिर भी एक साथ कई गाड़ियों का काफिला आता है तो लोग घर से निकल आते हैं लेकिन शहरों में तो लगता ही नहीं है कि चुनाव चल रहे हैं पोस्टर बैनर की भी वैसी पर बाढ़ नहीं है जैसे पहले हुआ करती थी। जनता की खामोशी कहे या उसमें उत्साह ना होने के दो ही कारण हो सकते हैं या तो लोग पहले से तय करके बैठे हैं कि किसे  वोट देना है या इस चुनाव और इसके प्रचार से तंग आ चुके हैं और गुस्से में भी है ये कुछ पता नहीं चल पा रहा है। 

gurat

राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा को भी राज्य के चुनाव से ज्यादा मतलब नहीं रह गया

यही वजह है कि जो भाजपा पहले जीत के लिए निश्चिंत रहती थी उसे भी पक्का भरोसा नहीं हो रहा। कांग्रेस ने जैसे सोच लिया है कि उसे अब राज्यों की सत्ता के लिए दौड़-धूप करनी है सीधे 2024 के लोकसभा चुनाव में ही वह अपने करतब दिखाएगी  ,राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा को भी राज्य के चुनाव से ज्यादा मतलब नहीं रह गया। उसका उद्देश्य अगला लोकसभा चुनाव में ही दिखाई दे रहा है। राजनीति के जानकार कहते हैं कि कांग्रेस और विपक्ष में बैठे तमाम दल अगले लोकसभा चुनाव में भाजपा को पूरी तरह से हराने की बजाय ढाई सौ सीटों तक सीमित करने के उद्देश्य से आगे बढ़ना चाहते हैं। क्योंकि जिस स्तर पर भाजपा बैठी है वहां से उसे सो डेढ़ सौ तक सीमित करना नामुमकिन है उसके ढाई सौ तक सीमित होने के कई दूरगामी मायने हो सकते हैं। विपक्ष उन्हीं दूरगामी इरादों  को साकार करने के लक्ष्य को लेकर चलना चाहता है  क्योंकि साफ़ दिखाई दे रहा है कि जिन राज्यों में सौ प्रतिशत लोकसभा सीटें भाजपा की हैं, वैसा का वैसा रिज़ल्ट तो इस बार आने की संभावना कम ही है। दो- दो, तीन- तीन सीटें भी घटती हैं तो विपक्ष का उद्देश्य पूरा होने की संभावना बढ़ जाती है।

gujrat

पूरा चुनाव इस बार बिहार की तरह जातीय गणित में उलझ गया है

  2023  तो विपक्ष का उद्देश्य पूरा होने की संभावना बढ़ जाती है वहीं जहां तक गुजरात की बात है यहां हर बार से ज्यादा संघर्ष है सभी पार्टियों के लिए चाहे वह भाजपा हो या कांग्रेस हो या आप पार्टी पहले भाजपा के प्रत्याशियों को स्पष्ट अंदाजा हुआ करता था जीत का ,इस बार ऐसा नहीं है ,पूरा चुनाव इस बार बिहार की तरह जातीय गणित में उलझ गया है। पार्टियों की बजाय इस बार जातीय ही वोट करेंगे और भी जीत हार का फैसला लेंगी इतना जरूर तय माना जा रहा है कि आप और कांग्रेस पार्टी सरकार बनाने के आंकड़े तक पहुंचने का दम भी नहीं बढ़ रही है। कुल मिलाकर बंपर जीत की अपेक्षा किसी से नहीं की जा सकती हालांकि जनता की खामोशी की असली वजह 8 दिसंबर को ही पता चलेगी जब परिणाम सामने आएंगे।